छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर अब उम्रकैद, 30 लाख जुर्माना
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर अब उम्रकैद, 30 लाख जुर्माना: विधानसभा में पेश नया कानून
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने गुरुवार को विधानसभा में 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026' पेश किया है. गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा पेश किया गया यह नया विधेयक वर्ष 1968 के पुराने कानून का स्थान लेगा, जिसे सरकार ने वर्तमान तकनीक और सामाजिक परिस्थितियों के लिहाज से नाकाफी माना है. इस प्रस्तावित कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसके बेहद कड़े दंडात्मक प्रावधान हैं, जिसके तहत सामूहिक धर्मांतरण जैसे गंभीर मामलों में दोषी को 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और कम से कम 30 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि लालच, भय, जबरदस्ती, कपट या विवाह के माध्यम से किया गया कोई भी धर्मांतरण पूर्णतः अवैध होगा. दिलचस्प बात यह है कि इस विधेयक में 'घर वापसी' यानी अपने पूर्वजों के धर्म में लौटने को धर्मांतरण की श्रेणी से बाहर रखा गया है, जिसे एक बड़ा नीतिगत बदलाव माना जा रहा है.
नया कानून केवल भौतिक दबाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें 'प्रलोभन' की परिभाषा को बहुत व्यापक बनाया गया है. अब मुफ्त शिक्षा, चिकित्सा सुविधा, रोजगार का वादा, उपहार या बेहतर जीवनशैली का लालच देना भी अपराध माना जाएगा. साथ ही, डिजिटल युग की चुनौतियों को देखते हुए सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से किए जाने वाले दुष्प्रचार और साजिशों को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है.
यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग, महिला, दिव्यांग या अनुसूचित जाति-जनजाति (SC/ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के व्यक्ति का अवैध रूप से धर्मांतरण कराता है, तो उसे 10 से 20 साल की कैद और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, यदि कोई लोक सेवक इस तरह की गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके लिए भी 20 साल तक की जेल का सख्त प्रावधान है.
विधेयक के अनुसार, अब धर्मांतरण की प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी और पूर्व-सूचना पर आधारित होगी. स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति और संबंधित धार्मिक गुरु को जिला मजिस्ट्रेट को पूर्व सूचना देनी होगी. प्रशासन इस आवेदन का विवरण आधिकारिक वेबसाइट, ग्राम पंचायत और पुलिस थानों में सार्वजनिक करेगा ताकि यदि किसी को आपत्ति हो तो वह दर्ज करा सके.
यदि 90 दिनों के भीतर धर्मांतरण संपन्न नहीं होता, तो आवेदन स्वतः निरस्त हो जाएगा. कानून में यह भी साफ कर दिया गया है कि केवल विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण या धर्मांतरण के लिए किया गया विवाह पूरी तरह शून्य और अवैध माना जाएगा.
पीड़ितों के संरक्षण के लिए सरकार ने 10 लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान किया है. साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि धर्मांतरण का प्रमाण पत्र नागरिकता या पहचान का आधार नहीं बनेगा. कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी जांच करेंगे और विशेष अदालतों में छह महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है.
सरकार ने यह भी अधिकार सुरक्षित रखा है कि वह कानून का उल्लंघन करने वाली संस्थाओं की विदेशी या घरेलू फंडिंग रोक सकती है और उन्हें दी जाने वाली सरकारी सहायता वापस ले सकती है.