कश्मीर में ही कर दिया गया छत्तीसगढ़िया मज़दूरों का अंतिम संस्कार
कश्मीर में ही हुआ छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मजदूरों का अंतिम संस्कार
रायपुर | संवाददाता: दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के केलाम इलाके में संदिग्ध चरमपंथियों के हमले में जान गंवाने वाले छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मज़दूरों, 21 वर्षीय दीपक रात्रे और 28 वर्षीय भूपेंद्र भैना का शनिवार को कश्मीर में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया. दोनों की मौत से उनके पैतृक गांवों में शोक की लहर है, वहीं राज्य सरकार ने पीड़ित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है.
गौरतलब है कि शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मजदूरों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकियों ने पहले मजदूरों से उनकी पहचान और नाम पूछे. इसके बाद हिंदू होने की पुष्टि होने पर दोनों को समूह से अलग किया और नजदीक से ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. इस निर्मम हमले में सक्ती जिले के दीपक रात्रे (24) और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के भूपेंद्र भैना (28) की मौत हो गई.
यह हमला कुलगाम से करीब 20 किलोमीटर दूर केलाम इलाके में स्थित एक ईंट भट्ठे पर शुक्रवार रात लगभग 8:30 बजे हुआ. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमले के दौरान 3 से 4 राउंड फायरिंग की आवाजें सुनी गईं.
घटना के बाद सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर सघन तलाशी अभियान शुरू कर दिया. सभी प्रमुख मार्गों पर वाहनों की जांच की जा रही है और हमलावरों की तलाश जारी है.
पहचान पूछकर बनाया निशाना
पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि हमला सुनियोजित तरीके से किया गया. आतंकियों ने पहले वहां मौजूद प्रवासी मजदूरों के नाम पूछे और फिर हिंदू मजदूरों को अलग कर नजदीक से गोली मार दी. उस समय ईंट भट्ठे पर कई प्रवासी मजदूर मौजूद थे, लेकिन हिंदू केवल दीपक और भूपेंद्र ही थे.
अधिकारियों का मानना है कि आतंकियों ने पहले से रेकी कर इस स्थान को निशाना बनाया था.
जांच एजेंसियों को संदेह है कि हमले में एक स्थानीय और एक विदेशी आतंकी शामिल थे. शुरुआती जांच का फोकस मोहम्मद लतीफ नामक संदिग्ध पर है, जो पिछले वर्ष लश्कर-ए-तैयबा/द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) से जुड़ा बताया जा रहा है. हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
दोनों गांवों में मातम
दीपक रात्रे सक्ती जिले के बुंदेली गांव के निवासी थे. वे परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे. उनके पिता का पहले ही निधन हो चुका है. परिवार में उनकी मां, दिव्यांग भाई, पत्नी और दो वर्षीय बेटा है. करीब एक वर्ष पहले वे पत्नी और बेटे के साथ रोजगार की तलाश में कश्मीर गए थे और ईंट भट्ठे में काम कर रहे थे.
वहीं, भूपेंद्र भैना सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के छुईहा गांव के रहने वाले थे. वे करीब तीन महीने पहले अपनी पत्नी के साथ काम की तलाश में कश्मीर पहुंचे थे. उनका दो वर्षीय बेटा गांव में दादी और छोटी बहन के पास रह रहा था. परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी पूरी तरह उन्हीं के कंधों पर थी. उनकी मौत से परिवार गहरे संकट में आ गया है.
शनिवार को दोनों मजदूरों का अंतिम संस्कार कश्मीर में ही किया गया. घटना की सूचना मिलते ही दोनों गांवों में शोक की लहर दौड़ गई और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है.
मुख्यमंत्री ने जताया शोक, 20-20 लाख की सहायता
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस आतंकी हमले पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे अमानवीय और निंदनीय बताया. उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ पूरा देश एकजुट है और निर्दोष नागरिकों की हत्या करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.
मुख्यमंत्री ने मृतक दोनों मजदूरों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की.
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस कठिन समय में पीड़ित परिवारों के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है.
प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा पर उठे सवाल
यह घटना एक बार फिर छत्तीसगढ़ से बड़े पैमाने पर होने वाले श्रमिक पलायन और प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है. सक्ती, सारंगढ़-बिलाईगढ़, जांजगीर-चांपा सहित कई जिलों से हर वर्ष हजारों मजदूर रोजगार की तलाश में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और दक्षिण भारत के राज्यों में जाते हैं. अधिकांश श्रमिक ईंट भट्ठों, निर्माण कार्यों और अन्य दिहाड़ी मजदूरी से जुड़े काम करते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित रोजगार, कृषि पर निर्भरता और आर्थिक मजबूरियां लोगों को पलायन के लिए विवश करती हैं. ऐसे में प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण और उनके लिए प्रभावी सुरक्षा तंत्र सुनिश्चित करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है.
कश्मीर में इन दिनों सेब तुड़ाई का मौसम शुरू हो रहा है और बड़ी संख्या में बाहरी राज्यों के श्रमिक वहां पहुंचते हैं. ऐसे समय में इस तरह का आतंकी हमला न केवल प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करेगा, बल्कि स्थानीय बागवानी और श्रम व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है.