कोटवार सेवा भूमि को भूमिस्वामी अधिकार में नहीं बदला जा सकता: HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की तीन जजों की फुल बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मालगुजारी या ज़मींदारी प्रथा के उन्मूलन से पहले ग्राम सेवा के बदले कोटवारों को दी गई 'सेवा भूमि' (Service Land) पर कोटवारों या उनके उत्तराधिकारियों को 'भूमिस्वामी' अधिकार नहीं दिया जा सकता.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा, न्यायमूर्ति रवीन्द्र कुमार अग्रवाल और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की पीठ ने कबीरधाम जिले के गजेन्द्र दास और सुकृत दास द्वारा दायर याचिकाओं के संदर्भ का निपटारा करते हुए यह व्यवस्था दी.
अदालत ने 'गंभीर दास पनिका' मामले में वर्ष 2018 के पूर्व निर्णय की पुष्टि करते हुए कहा कि वर्ष 1950 के मध्य प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की धारा 3 के तहत भूमि राज्य सरकार में निहित हो चुकी है.
कोटवार केवल ग्राम सेवक के रूप में सेवा प्रदान करने की शर्त पर इस भूमि का उपयोग कर सकते हैं.
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 183 के प्रावधानों के अनुसार, यह भूमि हस्तांतरणीय नहीं है और कोटवार के निधन या पद से हटने पर केवल उनके पद के उत्तराधिकारी को ही हस्तांतरित होती है.
अदालत ने माना कि पूर्व में 'विजय दास मानिकपुरी' मामले में दिया गया फैसला कानून के अनुसार सही नहीं था, क्योंकि उसमें 1950 के अधिनियम की धारा 3 के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया गया था. इस प्रकार, हाईकोर्ट ने सेवा भूमि को निजी मालिकाना हक में बदलने की मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया है.