Israel-Iran War: भारत पर महंगाई का खतरा
नई दिल्ली । डेस्क: इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में हलचल मचा दी है. इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हालिया हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 76 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जो पिछले पांच महीनों में सबसे ऊंचा स्तर है.
इस युद्ध का असर भारत सहित पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, क्योंकि तेल आपूर्ति में रुकावट का खतरा बढ़ गया है.
वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट
ईरान और इजरायल के बीच युद्ध का सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडरा रहा है, जहां से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है.
यदि ईरान इस मार्ग को अवरुद्ध करता है, तो सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा.
भारत पर आर्थिक प्रभाव
भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% आयात करता है, जिसमें से लगभग आधा पश्चिम एशिया से आता है. तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है.
वर्तमान में रुपये का मूल्य 86 प्रति डॉलर के आसपास है, और यह और कमजोर हो सकता है.
इसके अलावा, तेल की कीमतों में हर 10% की वृद्धि से भारत में खुदरा महंगाई दर में 0.3% का इजाफा हो सकता है.
आम जनता की जेब पर असर
तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा. पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत में वृद्धि होगी, जिससे खाद्य पदार्थों, सब्जियों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ेंगी.
उदाहरण के लिए, यदि ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 94 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 120-125 रुपये प्रति लीटर तक हो सकती है. रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में भी 100-150 रुपये प्रति सिलेंडर की वृद्धि हो सकती है.
इसके अलावा, उड़ान किराए और माल ढुलाई लागत में भी वृद्धि होगी, क्योंकि विमानन ईंधन और शिपिंग लागत तेल की कीमतों पर निर्भर करती है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत में महंगाई दर 6% से ऊपर जा सकती है, जिससे मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों पर भारी बोझ पड़ेगा.
ट्रंप की बयानबाजी से बढ़ता तनाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान से "बिना शर्त आत्मसमर्पण" की मांग की है, जिससे युद्ध और तनाव बढ़ने की आशंका और गहरा गई है. ट्रंप की सख्त नीति और अमेरिका की संभावित सैन्य भागीदारी से तेल बाजारों में अनिश्चितता बढ़ रही है.
यदि युद्ध में अन्य देश शामिल होते हैं, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी रुकावट आ सकती है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान तेल आयात पर निर्भर देशों जैसे भारत को होगा.
भारत सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक उपायों पर विचार कर रही है. रूस से रियायती तेल आयात पहले ही बढ़ाया गया है, लेकिन रूस से छूट कम होने के कारण यह रणनीति अब उतनी प्रभावी नहीं रह गई है.
भारत के पास रणनीतिक तेल भंडार हैं, जिनका उपयोग आपातकाल में किया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक युद्ध की स्थिति में ये भंडार पर्याप्त नहीं होंगे.
इजरायल-ईरान युद्ध ने वैश्विक तेल बाजारों को अस्थिर कर दिया है, और इसका असर भारत के आम नागरिकों पर महंगाई के रूप में सामने आएगा. सरकार को तेल आयात के वैकल्पिक स्रोत तलाशने और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर देने की जरूरत है ताकि भविष्य में इस तरह के संकटों से बचा जा सके.
फिलहाल, भारतीयों को बढ़ती कीमतों और आर्थिक अनिश्चितता के लिए तैयार रहना होगा.