इजरायल: तेल अवीव में उठी मांग, नेतन्याहू को हटाने को अरब पार्टियों से मिलाएं हाथ
इजरायल में चुनाव के बाद बने गतिरोध के बीच तेल अवीव में बड़ा प्रदर्शन हुआ है, जहां प्रदर्शनकारियों ने मुख्य विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट से अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की अपील की है.
नई दिल्ली । डेस्क: इजरायल के तेल अवीव में हजारों की संख्या में लोगों ने रैली निकालकर विपक्षी दलों से अरब पार्टियों के साथ समझौता करने और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का आग्रह किया है. शनिवार को हुए इस प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना था कि यह वास्तविक बदलाव का आखिरी मौका हो सकता है, जबकि उन्होंने इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू को एक बड़ा जोड़-तोड़ करने वाला नेता करार दिया.
मंगलवार को हुए चुनावों में किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से गतिरोध पैदा हो गया है. 120 सीटों वाली इजराइली संसद में नेतन्याहू के गुट ने 53 सीटें जीती हैं, जबकि मुख्य विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के गुट को 48 सीटें मिली हैं. इस चुनाव में अरब नेतृत्व वाली तीन पार्टियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 19 सीटें हासिल की हैं.
इजरायल के दक्षिणपंथी हलकों द्वारा फिलिस्तीनी इजराइलियों के इस ऐतिहासिक मतदान को 'चुनावी आतंकवाद' तक कहा जा रहा है और इसकी तुलना 7 अक्टूबर के हमले से की जा रही है. फिलिस्तीनी-इजराइली मतदाताओं की आवाज इसलिए निशाने पर है क्योंकि नई सरकार के गठन में उनकी भूमिका बेहद अहम हो गई है.
केंद्रीय चुनाव समिति के अनुसार, लगभग 8,40,000 लोगों ने राअम (Ra’am) और जॉइंट लिस्ट को वोट दिया, जो 2022 के पिछले चुनावों की तुलना में 64 प्रतिशत अधिक है.
यदि आइजेनकोट की पार्टी अरब गुट के साथ आती है, तो उनके पास 67 सीटों का स्पष्ट बहुमत हो जाएगा. हालांकि, आइजेनकोट ने पहले अरब पार्टियों के साथ गठबंधन से इनकार किया था, लेकिन प्रदर्शनकारियों का मानना है कि नेताओं को जनता की आवाज सुननी चाहिए.
दूसरी ओर, शनिवार को नेतन्याहू समर्थकों ने भी जवाबी प्रदर्शन किया और नारे लगाए कि इजरायल में तथाकथित आतंकवादियों के साथ मिलकर सरकार नहीं बननी चाहिए.
इस बीच, नेतन्याहू ने फिलिस्तीनी-इजराइली पार्टियों पर चुनाव चुराने और कतर से फंडिंग लेने का आरोप लगाया है, जिसे कतर ने दुष्प्रचार अभियान बताते हुए खारिज कर दिया है.
इजरायल के दक्षिणपंथी हलकों द्वारा फिलिस्तीनी इजराइलियों के इस ऐतिहासिक मतदान को 'चुनावी आतंकवाद' तक कहा जा रहा है और इसकी तुलना 7 अक्टूबर के हमले से की जा रही है. फिलिस्तीनी-इजराइली मतदाताओं की आवाज इसलिए निशाने पर है क्योंकि नई सरकार के गठन में उनकी भूमिका बेहद अहम हो गई है.