ऐतिहासिक मोड़ पर इजराइल: आम चुनाव में नेतन्याहू की साख दांव पर
इजराइल में संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. अक्टूबर 2023 के हमलों और गाजा संघर्ष के बाद हो रहे इस बेहद अहम चुनाव में नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य और देश की भावी दिशा दांव पर लगी है.
नई दिल्ली । डेस्क: इजराइल में 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) के सदस्यों को चुनने के लिए मतदान शुरू हो चुका है. 7 अक्टूबर 2023 के हमलों और उसके बाद गाजा पट्टी में शुरू हुए लंबे युद्ध के बाद देश में हो रहा यह पहला आम चुनाव है. बहुस्तरीय सैन्य संघर्षों, गंभीर आंतरिक ध्रुवीकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दबाव के बीच हो रहे इस चुनाव को इजराइल के आधुनिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक माना जा रहा है.
इस मतदान से न केवल देश की भावी सरकार का स्वरूप तय होगा, बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ते इजराइल का अगला रुख क्या होगा.
मुख्य राजनीतिक दल और सर्वेक्षणों का रुझान
इजराइल की निर्वाचन प्रणाली के अनुसार संसद में प्रवेश के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वोटों की सीमा पार करना अनिवार्य है. इस बार मुख्य मुकाबला दो बड़े गठबंधनों के बीच देखा जा रहा है.
पहला गुट प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का प्रो-नेतन्याहू गठबंधन है, जिसका नेतृत्व उनकी लिकुड पार्टी कर रही है. इसमें यूनाइटेड टोराह जुडाइज्म (UTJ), शास (Shas) जैसी अति-रूढ़िवादी धार्मिक पार्टियां तथा इतामार बेन-गवीर की ओत्ज़मा येहुदी और बेज़ालेल स्मोट्रिच की रिलिजियस ज़ायनिज़्म-ज़ेहुत शामिल हैं.
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी गठबंधन है, जिसमें चार प्रमुख यहूदी-नेतृत्व वाले दल शामिल हैं. इनमें पूर्व सैन्य प्रमुख गादी ईसेनकोट की यशार पार्टी, याइर गोलान के नेतृत्व वाली द डेमोक्रेट्स, पूर्व वित्त मंत्री एविग्डोर लिबरमैन की यिस्राइल बेइतेनु और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट व विपक्ष के नेता याइर लापिड के नेतृत्व वाला 'टुगेदर' गठबंधन शामिल हैं.
चुनाव पूर्व हुए अंतिम सर्वेक्षणों के संकेत के अनुसार, दोनों में से किसी भी मुख्य गठबंधन को स्पष्ट बहुमत (61 सीटें) मिलता नहीं दिख रहा है. सार्वजनिक प्रसारक KAN के पोल के मुताबिक विपक्ष को 52 और नेतन्याहू के गुट को 50 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि शेष सीटें अन्य असंबद्ध दलों को मिल सकती हैं. ऐसे में चुनाव के बाद गठबंधन बनाने के लिए जटिल मोलभाव होने के आसार हैं और बहुमत न मिलने पर अल्पमत सरकार या दोबारा चुनाव की नौबत भी आ सकती है.
देश के सामने खड़े प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दे
इजराइली जनता इस समय कई जटिल आंतरिक और विदेशी संकटों से जूझ रही है. देश के भीतर अक्टूबर 2023 के सुरक्षा विफलताओं की जवाबदेही तय करने की मांग तेज है. इसके अलावा, अति-रूढ़िवादी (हारेदी) समुदाय को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट पर आम जनता में गहरा असंतोष है.
नेतन्याहू सरकार द्वारा न्यायपालिका में किए जाने वाले सुधारों के प्रयासों ने भी देश में विवाद पैदा किया है. आलोचकों और धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी विपक्ष का मानना है कि ये सुधार इजराइल के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करते हैं. दूसरी ओर, युद्ध से त्रस्त नागरिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता चाहते हैं, हालांकि गाजा, वेस्ट बैंक या लेबनान में रणनीतिक रियायतों को लेकर आम जनता में राय बंटी हुई है.
अंतरराष्ट्रीय स्थिति और चुनाव का महत्व
यह चुनाव इजराइल की अंतरराष्ट्रीय साख के लिहाज से भी निर्णायक है. गाजा और लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाइयों तथा वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों के निर्माण को लेकर कई मित्र देशों ने भी कड़े रुख अपनाए हैं और प्रतिबंध लगाए हैं. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेतन्याहू के संबोधन के दौरान कई देशों के प्रतिनिधियों ने विरोध जताते हुए वॉकआउट किया था. नए जनादेश से यह तय होगा कि इजराइल अपनी मौजूदा नीतियों पर कायम रहता है या वैश्विक संबंधों को सुधारने का प्रयास करता है.
बेंजामिन नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य
इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह चुनाव व्यक्तिगत और राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है. 2019 से भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे नेतन्याहू को यदि सत्ता से हाथ धोना पड़ता है, तो कानूनी प्रक्रियाएं उन पर और हावी हो सकती हैं. एक नई सरकार का गठन अक्टूबर हमलों की निष्पक्ष जांच के लिए आयोग बनाने और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के वारंट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बड़ा असर डालेगा.
फिलिस्तीनी मूल के इजराइली नागरिकों की भूमिका
इजराइल के कुल 73 लाख मतदाताओं में से लगभग 12 लाख फिलिस्तीनी मूल के नागरिक हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस समुदाय का मतदान प्रतिशत 60 से 65 प्रतिशत तक पहुंचता है, तो अरब-नेतृत्व वाली सूचियां (जैसे रा'अम और जॉइंट लिस्ट) 15 सीटों तक हासिल कर सकती हैं.
यद्यपि दोनों मुख्य यहूदी गठबंधनों ने फिलहाल इन अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन की संभावना से इनकार किया है, लेकिन 61 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए इनकी भूमिका निर्णायक साबित हो सकती है. त्रिशंकु स्थिति में राजनीतिक गतिरोध बनाए रखना भी नेतन्याहू के रणनीतिक गणित का हिस्सा माना जा रहा है.