प्रेस की आजादी पर ट्रंप से सीधी टक्कर: मीडिया संस्थानों के बाद अब अमेरिकी जनता पहुंची अदालत
क्या सरकार यह तय कर सकती है कि जनता तक क्या खबर पहुंचेगी? ट्रंप प्रशासन द्वारा स्वतंत्र मीडिया के बहिष्कार के खिलाफ अब अमेरिकी नागरिक, शिक्षक और छात्र अदालत पहुंचे हैं. उनका तर्क है कि प्रेस की आजादी पर हमला सीधे जनता के जानने के अधिकार पर हमला है.
नई दिल्ली । डेस्क: व्हाइट हाउस और अमेरिकी मीडिया के बीच लंबे समय से चला आ रहा कानूनी और राजनीतिक तनाव अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कुछ प्रमुख मीडिया घरानों के पत्रकारों के व्हाइट हाउस में प्रवेश पर बैन लगाने के फैसले के विरोध में अब खुद अमेरिकी नागरिक भी मैदान में उतर आए हैं. न्यूयॉर्क की फेडरल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर की गई एक नई याचिका में छह आम नागरिकों ने तर्क दिया है कि राष्ट्रपति द्वारा स्वतंत्र मीडिया पर प्रतिबंध लगाना न केवल पत्रकारों के अधिकारों का हनन है, बल्कि यह अमेरिकी जनता के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी सीधा हमला है.
यह याचिका नाइट फर्स्ट अमेंडमेंट इंस्टीट्यूट और येल लॉ स्कूल की लीगल क्लिनिक के सहयोग से दाखिल की गई है. इसमें तर्क दिया गया है कि अमेरिकी संविधान का प्रथम संशोधन (First Amendment) केवल पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं देता, बल्कि जनता को यह जानने का मौलिक अधिकार भी प्रदान करता है कि उसकी सरकार क्या कर रही है. जब सरकार अपनी आलोचना करने वाले पत्रकारों या संस्थानों को बाहर करती है, तो इससे निष्पक्ष और स्वतंत्र रिपोर्टिंग का गला घुटता है और जनता तक केवल सरकारी प्रचार पहुंचने का खतरा बन जाता है.
नागरिकों की नजर से सूचना का अधिकार
इस नए मुकदमे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वादी कोई बड़ा मीडिया समूह नहीं, बल्कि समाज के वे प्रतिनिधि हैं जिन्हें अपने दैनिक काम और शिक्षा के लिए निष्पक्ष समाचारों की जरूरत होती है. याचिकाकर्ताओं में एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता, राजनीतिक पत्रकार, येल यूनिवर्सिटी के इतिहास के प्रोफेसर, हाई स्कूल के नागरिक शास्त्र के शिक्षक और विश्वविद्यालय के छात्र पत्रकार शामिल हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के छात्र और दैनिक समाचार पत्र के संपादक एथन यंग का कहना है कि वे स्वयं व्हाइट हाउस की कार्यवाही में शामिल नहीं हो सकते, इसलिए वे वहां मौजूद विविध और स्वतंत्र पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर निर्भर रहते हैं. वहीं, न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन टेक्निकल हाई स्कूल के शिक्षक पीटर श्मिट-नोवारा का मानना है कि छात्रों को लोकतंत्र और सरकार की कार्यप्रणाली समझाने के लिए निष्पक्ष समाचार बेहद जरूरी हैं. उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा पत्रकारों पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों से भावी पीढ़ी तक सही और सटीक जानकारी पहुंचने का रास्ता बंद हो रहा है.
व्हाइट हाउस की नीतियां और व्यापक राहत की मांग
इस मुकदमे में राष्ट्रपति ट्रंप के अलावा उनके चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स, कम्युनिकेशंस डायरेक्टर स्टीवन चेउंग और सीक्रेट सर्विस के प्रमुख को भी पक्षकार बनाया गया है. याचिका में अदालत से यह मांग की गई है कि व्हाइट हाउस की इस भेदभावपूर्ण नीति को असंवैधानिक घोषित किया जाए. साथ ही, केवल प्रभावित पत्रकारों को ही राहत न दी जाए, बल्कि एक व्यापक अदालती आदेश जारी किया जाए जिससे भविष्य में भी किसी मीडिया संस्थान को निष्पक्ष कवरेज करने के कारण प्रतिशोध का शिकार न होना पड़े.
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले सीएनएन, एमएस नाउ, पोलिटिको, एसोसिएटेड प्रेस और द न्यू यॉर्क टाइम्स जैसे बड़े संस्थान ट्रंप प्रशासन के विभिन्न फैसलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. हाल ही में एक अदालत ने ट्रंप प्रशासन के उस फैसले पर अंतरिम रोक भी लगाई थी जिसके तहत पत्रकारों को व्हाइट हाउस से निकाला गया था. हालांकि, ताजा याचिका ने इस पूरे विवाद को मीडिया बनाम सरकार की लड़ाई से उठाकर जनता बनाम सरकार के अधिकार की व्यापक बहस में बदल दिया है.