तिब्बत में दुनिया का सबसे बड़ा बांध: भारत-बांग्लादेश में बाढ़ के खतरे की चीनी वैज्ञानिकों की चेतावनी
चीन द्वारा तिब्बत में दुनिया का सबसे बड़ा 60,000 मेगावाट का बांध बनाने और ग्लोबल वार्मिंग के चलते ब्रह्मपुत्र नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है. चीनी वैज्ञानिकों के एक नए शोध ने चेतावनी दी है कि इस सदी में भारत और बांग्लादेश के निचले इलाकों को भयानक बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है.
नई दिल्ली । डेस्क: हिमालय के संवेदनशील इलाकों में चीन द्वारा बनाए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट ने भारत और बांग्लादेश के लिए बड़ी चिंता पैदा कर दी है. चीनी वैज्ञानिकों के एक नए शोध में चेतावनी दी गई है कि इस सदी में ब्रह्मपुत्र (तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो) नदी के प्रवाह में भारी बढ़ोतरी होगी, जिससे निचले इलाकों में स्थित भारत और बांग्लादेश को भीषण बाढ़ के जोखिम का सामना करना पड़ सकता है.
चीनी विज्ञान अकादमी (Chinese Academy of Sciences) और युन्नान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वर्ष 1325 से 2020 तक के लगभग सात शताब्दियों के नदी प्रवाह के आंकड़ों का अध्ययन किया.
दक्षिण-पूर्वी तिब्बती पठार के पेड़ों के छल्लों (Tree-ring records) और जलवायु आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए मॉडल से यह स्पष्ट हुआ है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण नदी में जल प्रवाह और बाढ़ जैसी चरम स्थितियों में काफी इजाफा होगा. यह शोध हाल ही में जर्नल 'चाइना साइंस बुलेटिन' में प्रकाशित हुआ है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, तिब्बती पठार वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है. इसके चलते बर्फ पिघलने की दर और जल चक्र में बड़े बदलाव आ रहे हैं. यह बदलाव न केवल पठार के इकोसिस्टम को प्रभावित कर रहा है, बल्कि दक्षिण एशिया में सूखे और बाढ़ के पैटर्न पर भी गहरा असर डाल रहा है.
चीन यह विशालकाय हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तिब्बत के मेडोग (मोतुओ) काउंटी में बना रहा है, जो भारत के अरुणाचल प्रदेश सीमा के बेहद करीब है. लगभग 168 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट की क्षमता 60,000 मेगावाट से अधिक होगी. यह क्षमता चीन के ही 'थ्री गॉर्जियस डैम' से करीब तीन गुना ज्यादा है.
यह बांध उस जगह बनाया जा रहा है जहां नदी एक तीखा 'यू-टर्न' लेकर भारत में प्रवेश करती है.
इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर सुरक्षा और भौगोलिक चुनौतियां भी बेहद गंभीर हैं. जुलाई में चीनी भूवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि बांध स्थल के ठीक नीचे एक सक्रिय फॉल्ट लाइन (Active Fault Line) मौजूद है. इस भूकंपीय क्षेत्र में भूस्खलन और चट्टानों के ढहने का खतरा लगातार बना रहता है, जिसके लिए ढलान स्थिरता और सुरक्षात्मक उपायों की सख्त जरूरत है.
हाल ही में चीन-नेपाल सीमा पर हुई विनाशकारी फ्लैश फ्लड की घटना ने हिमालयी क्षेत्र की नाजुक संरचना और खतरों को उजागर किया है.
चीन के विदेश मंत्रालय ने पूर्व में इस प्रोजेक्ट का बचाव करते हुए कहा था कि सुरक्षा उपायों और दशकों के अध्ययन के बाद ही काम शुरू किया गया है तथा इससे निचले देशों को कोई नुकसान नहीं होगा. हालांकि, चीनी वैज्ञानिकों का ही यह नया शोध स्पष्ट करता है कि सीमा पार जल संसाधनों के प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग में भविष्य के जल प्रवाह के खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.