सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग का दावा: सभी निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से हुए
निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगे एकाधिकार के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR समेत सभी प्रमुख निर्णय तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं.
नई दिल्ली । डेस्क: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा अन्य दो निर्वाचन आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अपने विस्तृत हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने कहा है कि याचिका में लगाए गए सभी आरोप केवल एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित हैं, जिसकी कानून की नजर में कोई साक्ष्य योग्य साख नहीं होती. आयोग ने स्पष्ट किया कि उसने कभी भी कोई आंतरिक दस्तावेज या फाइल किसी मीडिया एजेंसी को जारी नहीं की है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत यह हलफनामा भी तीनों निर्वाचन आयुक्तों के सर्वसम्मति वाले निर्णय के बाद ही तैयार और दाखिल किया गया है.
फैसले लेने की प्रक्रिया और सेक्शन 18 का संदर्भ
आयोग ने शीर्ष अदालत को अपनी कार्यप्रणाली की जानकारी देते हुए बताया कि निर्वाचन आयोग में किसी भी फाइल के निस्तारण की एक निश्चित और पारदर्शी प्रक्रिया है. फाइल सबसे पहले एक निर्वाचन आयुक्त के पास जाती है, फिर दूसरे आयुक्त के पास और अंत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास पहुंचती है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान यदि कोई आयुक्त कोई सुझाव, टिप्पणी या प्रश्न दर्ज करता है, तो उसे 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023' की धारा 18 के तहत आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि बेहद आवश्यक या आपातकालीन मामलों में सदस्य अपनी मंजूरी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से देते हैं, जिसे बाद में आधिकारिक रूप से फाइल पर दर्ज कर लिया जाता है. इसके साथ ही, बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के आदेश जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है.
SIR के आदेशों पर विवाद और आंतरिक कार्य आवंटन
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित अन्य लोगों की याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि आयोग में शक्तियों का केंद्रीयकरण हो गया है और दो आयुक्तों की सहमति के बिना कई कदम उठाए गए हैं. याचिका में 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों आयुक्तों द्वारा दर्ज कराई गई 14 आपत्तियों का हवाला दिया गया था. इन आरोपों का जवाब देते हुए आयोग ने साफ किया कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए सभी तीन 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) आदेश तीनों सदस्यों की पूर्ण सहमति से जारी किए गए थे.
जहां तक आंतरिक कार्य आवंटन से जुड़े विवाद का प्रश्न है, आयोग ने अदालत को अवगत कराया कि 28 जुलाई 2026 का आदेश प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अतिरिक्त सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी द्वारा जारी किया गया था. इसके विरोध में 29 जुलाई को दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था. इसके पश्चात, 30 जुलाई 2026 को दोनों आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद उस विवादित आदेश को लागू ही नहीं किया गया. इसलिए इस पत्राचार के आधार पर लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह से भ्रामक और गलतफहमी पर आधारित हैं.
फॉर्म 6 संशोधन विवाद और ऑनलाइन व्यवस्था में बदलाव
नये मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव के विवाद पर निर्वाचन आयोग ने कहा कि नियमानुसार केवल केंद्र सरकार ही किसी वैधानिक फॉर्म में संशोधन कर सकती है, आयोग के पास यह अधिकार नहीं है. एसआईआर (SIR) घोषणापत्र एक बिल्कुल अलग दस्तावेज है. हालांकि, आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर इसे जिस तरह प्रदर्शित किया गया था, उससे यह भ्रम पैदा हो सकता था कि फॉर्म 6 में ही संशोधन कर दिया गया है. आयोग ने बताया कि आवेदकों की सुविधा के लिए single OTP और e-sign की व्यवस्था की गई थी. अब इस भ्रम को दूर करने के लिए निर्वाचन आयोग के ईआर डिविजन ने 21 अक्टूबर 2026 को यह फैसला लिया है कि ऑनलाइन आवेदन को भी भौतिक फॉर्म की तरह ही दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया जाएगा.
अनमैप्ड मतदाता, ECINet और याचिका की पोषणीयता
अदालत के समक्ष आयोग ने अन्य व्यावहारिक सुधारों की जानकारी भी दी. अनमैप्ड मतदाताओं के संदर्भ में 26 सितंबर 2026 को यह तय किया गया है कि बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) खुद मतदाताओं के घर जाकर आवश्यक दस्तावेज एकत्र करेंगे ताकि आम नागरिकों को ईआरओ या एईआरओ कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें. केवल बेहद दुर्लभ मामलों में ही सुनवाई होगी और वह भी प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन आयोजित की जाएगी. इसके अलावा, ECINet की कानूनी अनुपालन जांच के लिए 14 अक्टूबर 2026 को IIT मुंबई और IISc बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति गठित की गई है.
अंत में, संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है. इसलिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकारों को रोकने संबंधी याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है. आयोग ने यह हलफनामा दशहरा अवकाश के कारण संक्षेप में दायर किया है और अदालत से बिंदुवार विस्तृत जवाब दाखिल करने की अनुमति मांगी है.