इस्लामाबाद शांति वार्ता: क्या थम जाएगा महायुद्ध?
इस्लामाबाद । डेस्क: पाकिस्तान की राजधानी इस समय दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक केंद्र बनी हुई है. सड़कों पर नई पेंटिंग हो रही है, सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं और हवा में उम्मीद के साथ-साथ गहरी चिंता भी है. दरअसल, शनिवार से इस्लामाबाद उस ऐतिहासिक शांति वार्ता की मेजबानी करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे विनाशकारी युद्ध को रोकना है.
करीब छह सप्ताह पहले शुरू हुए इस संघर्ष ने न केवल हजारों जानें ली हैं, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' को बंद कर वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है. अब सबकी निगाहें इस्लामाबाद के सेरेना होटल पर टिकी हैं.
शांति की मेज पर आमने-सामने होंगे दिग्गज
व्हाइट हाउस ने पुष्टि की है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे. उनके साथ डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर भी शामिल होंगे. दूसरी ओर, ईरान की तरफ से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अरागची मोर्चा संभालेंगे.
दिलचस्प बात यह है कि जेडी वेंस की मौजूदगी को ईरान एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहा है. ईरानी अधिकारियों का मानना है कि वेंस मध्य पूर्व में लंबी सैन्य भागीदारी के खिलाफ रहे हैं, जिससे एक स्थायी समाधान की उम्मीद जगी है.
बातचीत का केंद्र: सेरेना होटल और 'शटल डिप्लोमेसी'
वार्ता का मुख्य केंद्र इस्लामाबाद का 'रेड ज़ोन' होगा. सुरक्षा के मद्देनजर 9 और 10 अप्रैल को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस पूरी प्रक्रिया के औपचारिक मेजबान हैं.
बातचीत की प्रक्रिया:
अमेरिकी और ईरानी टीमें एक ही होटल के अलग-अलग कमरों में बैठेंगी.
पाकिस्तानी अधिकारी 'मैसेंजर' की भूमिका निभाते हुए एक कमरे से दूसरे कमरे तक संदेश पहुँचाएंगे.
यह प्रक्रिया शनिवार सुबह से शुरू होकर अगले 15 दिनों तक चल सकती है.
क्या हैं दोनों पक्षों की शर्तें?
ईरान ने शांति के लिए 10-सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण और मध्य पूर्व से अमेरिकी सेना की वापसी जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं. वहीं, अमेरिका का मुख्य जोर इस बात पर है कि ईरान अपना समृद्ध यूरेनियम का भंडार पूरी तरह सरेंडर कर दे. हालांकि, ट्रंप ने ईरान के 10-सूत्रीय प्लान को 'काम करने योग्य' बताया है, लेकिन यूरेनियम के मुद्दे पर गतिरोध बरकरार है.
लेबनान: शांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा
इस समय सबसे बड़ी चुनौती लेबनान में जारी इजरायली बमबारी है. ईरान का कहना है कि संघर्ष विराम का मतलब पूरे क्षेत्र में शांति है, जिसमें लेबनान भी शामिल है. वहीं, जेडी वेंस और अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि मौजूदा युद्धविराम की शर्तों में लेबनान शामिल नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इजरायल इस प्रक्रिया में 'स्पॉइलर' यानी बाधा डालने वाले की भूमिका निभा सकता है. पूर्व राजदूत मसूद खालिद के अनुसार, इजरायल की बमबारी का उद्देश्य दोनों पक्षों को उकसाना है ताकि वार्ता विफल हो जाए.
मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की बढ़ती अहमियत
पाकिस्तान इस समय वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक मजबूत कड़ी बनकर उभरा है. इसके कई कारण हैं:
भौगोलिक स्थिति: ईरान के साथ पाकिस्तान की 900 किलोमीटर लंबी सीमा.
धार्मिक जुड़ाव: ईरान के बाद पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी है.
तटस्थता: पाकिस्तान में कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं है, जिससे ईरान उस पर भरोसा कर पा रहा है.
कूटनीति: पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की पर्दे के पीछे की सक्रियता ने इस वार्ता को संभव बनाया है.
क्या निकलेगा कोई ठोस नतीजा?
विशेषज्ञ इस समय 'सावधान आशावाद' की स्थिति में हैं. विश्वास की कमी सबसे बड़ी बाधा है. जहाँ एक ओर ईरान को डर है कि बातचीत के दौरान भी अमेरिका हमले कर सकता है, वहीं अमेरिका को ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर संदेह है.
विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस वार्ता के दौरान अमेरिका इजरायल को लेबनान पर हमले रोकने के लिए मना लेता है, तो यह डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी. फिलहाल, पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं और हर किसी की नजर इस्लामाबाद से निकलने वाले आधिकारिक बयानों पर है.
क्या यह शनिवार दुनिया को एक महायुद्ध से मुक्ति दिला पाएगा या गतिरोध और गहराएगा? इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिल जाएगा.