क्या अमेरिकी डॉलर का किला ढह रहा है?
नई दिल्ली । डेस्क: जोहान्सबर्ग और प्रिटोरिया से उठी वित्तीय हलचल ने नया सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दशकों से अभेद्य माना जा रहा अमेरिकी डॉलर का किला अब ढहने की कगार पर है? 2025 के जी-20 शिखर सम्मेलन के साये में दक्षिण अफ्रीका के 'स्टैंडर्ड बैंक' का चीन के 'क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम' (CIPS) से जुड़ना महज एक बैंकिंग समझौता नहीं, बल्कि डॉलर के वर्चस्व पर एक सीधा प्रहार है.
यह कदम संकेत है कि ग्लोबल साउथ अब वाशिंगटन की मौद्रिक नीतियों के 'एकाधिकार' को ढोने के मूड में नहीं है.
डॉलर के इस किले में दरारें पड़ने का सबसे बड़ा कारण इसकी 'छिपी हुई लागत' और राजनीतिक हथियार के रूप में इसका बढ़ता इस्तेमाल है. विशेषज्ञ सानुषा नायडू के अनुसार, डॉलर में होने वाले हर ट्रांजैक्शन का एक हिस्सा टैक्स के रूप में अमेरिका की जेब में जाता है. आज जब ब्रिक्स (BRICS) देश जिसमें भारत, चीन, रूस और ब्राजील जैसे दिग्गज शामिल हैं, दुनिया की 85% आबादी और 50% जीडीपी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो वे पूछ रहे हैं कि वैश्विक व्यापार का यह 'हफ्ता' अमेरिका को क्यों दिया जाए?
रूस पर लगे प्रतिबंधों ने इस डर को और पुख्ता कर दिया है कि डॉलर केवल मुद्रा नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक फंदा भी हो सकता है.
किले की दीवारों को कमजोर करने में 'ब्रिक्स पे' (BRICS Pay) और 'प्रोजेक्ट एम-ब्रिज' (mBridge) जैसी तकनीकों की भूमिका अहम है. ये प्रणालियाँ ब्लॉकचेन के जरिए डॉलर और 'स्विफ्ट' (SWIFT) के नेटवर्क को बाईपास करने का रास्ता खोल रही हैं.
भारत और यूएई का रुपये-दिरहम में व्यापार करना, ब्राजील और चीन का सीधे युआन में सोयाबीन खरीदना और रूस-चीन का अपनी मुद्राओं में तेल का लेनदेन करना इस बात का प्रमाण है कि विकल्प अब कागजों से निकलकर हकीकत बन रहे हैं. खुद अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता और 38 ट्रिलियन डॉलर का भारी-भरकम कर्ज डॉलर की साख को 'स्लो बर्न' यानी धीमी आंच पर झुलसा रहा है.
हालांकि, डॉलर का किला रातों-रात मलबे में तब्दील नहीं होने वाला. जानकारों का मानना है कि भले ही डॉलर की नींव हिल रही हो, लेकिन फिलहाल दुनिया के पास इसके जैसा कोई दूसरा 'सुरक्षित' विकल्प मौजूद नहीं है.
युआन अभी भी वैश्विक व्यापार के एक छोटे हिस्से तक सीमित है और अन्य मुद्राओं में वह तरलता नहीं है जो डॉलर में है. लेकिन 'पेट्रोडॉलर' की जगह 'पेट्रोयुआन' की आहट और सोने की बढ़ती कीमतों ने यह साफ कर दिया है कि अब दुनिया एक 'मल्टी-करेंसी' व्यवस्था की ओर बढ़ रही है.
अंततः, डॉलर का किला शायद आज न गिरे, लेकिन इसकी प्रासंगिकता का सूरज ढलने लगा है. डॉलर अब एक 'घायल सम्राट' की तरह है, जो अपनी सत्ता बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा, लेकिन ग्लोबल साउथ की आत्मनिर्भरता की यह लहर इस किले की दीवारों को हर गुजरते दिन के साथ खोखला कर रही है.