क्या चीनी हमारे जीवन में जहर घोल रही है ?
चीनी का अतिरिक्त उपयोग जीवन में
रायपुर | आयुषी शर्माः इन दिनों अमरीका में बहस चल रही है कि क्या चीनी यानी शक्कर ज़हर है? अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा सचिव रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर ने कहा है कि चीनी जहर है और अमेरिकियों को इस ज़हर से बचने की ज़रुरत है.
इस सलाह के बाद दुनिया भर में एक बार फिर चीनी पर चर्चा शुरु हो गई है.
अमरीका के स्वास्थ्य सचिव रॉबर्ट एफ कैनेडी ने इस सप्ताह एक प्रेस कांफ्रेस में कहा कि खाद्य पदार्थों के लिए बेहतर लेबलिंग की आवश्यकता है और पोषण पर नए सरकारी दिशा-निर्देश, लोगों को चीनी से पूरी तरह बचने की सलाह देंगे.
कैनेडी ने कहा कि चीनी जहर है. हमें अमेरिकियों को यह जानकारी देना होगा कि उनके उत्पादों में कितनी चीनी है और साथ ही नए पोषण दिशा-निर्देशों के साथ हम उन्हें इस बारे में बहुत स्पष्ट बताएंगे कि उन्हें कितनी चीनी का उपयोग करना चाहिए. मेरी राय में यह शून्य होना चाहिए.
एक अन्य बयान में कैनेडी ने कहा कि जब मैं बच्चा था, तब एक सामान्य शिशु रोग विशेषज्ञ अपने जीवनकाल में मधुमेह का एक मामला देखता था.
आज उसके अस्पताल में आने वाला हर तीसरा बच्चा मधुमेह से ग्रस्त है.
कैनेडी ने दावा किया कि अमरीका मधुमेह जैसे माइटोकॉन्ड्रियल विकारों पर उतना ही खर्च कर रहा है, जितना वह अपने सैन्य बजट पर खर्च करता है.
चीनी ने स्वाद के साथ ही भूगोल भी बदला
वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य को मौसमी फलों या शहद का मीठापन कैलोरी के साथ-साथ स्वाद का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता था.
लेकिन चीन में जब चुकंदर और गन्ने की खेती के साथ चीनी यानी शक्कर के निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई तो इसने पूरी दुनिया में स्वाद को एक नई परिभाषा दी.
चीनी ने स्वाद का इतिहास बदला और भूगोल भी. आप में से अधिकांश लोगों को पता होगा कि ब्राजील जैसे देश में लगभग 500 साल पहले तक 15 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में अटलांटिक वन फैले हुए थे. लेकिन पशुपालन, लकड़ी और चीनी उगाने के लिए गन्ने की खेती के लिए ये जंगल कटते चले गए औऱ आज की तारीख़ में इस जंगल का महज 10 फ़ीसदी हिस्सा बचा है.
भारत में बढ़ती खपत खतरे की घंटी
आज की तारीख़ में भारत समेत दुनिया के अधिकांश हिस्से की एक बड़ी आबादी के दिन की शुरुआत इसी चीनी या शक्कर से होती है.
इस प्रोसेस्ड चीनी को हम चाय में लेते हैं या दूध में, डबलरोटी में या बिस्किट में. अधिकांश मीठी चीजों में इस चीनी की उपस्थिति लगभग अनिवार्य हो गई है.
लेकिन यही मिठास अब जीवन में खटास पैदा करने का एक बड़ा जरिया बनकर उभर रही है.
बरसों पहले जब चीनी का इस्तेमाल सीमित मात्रा में होता था, तब इसका नुकसान कम था.
मगर अब जब रोज़ाना के खाने-पीने में चीनी का दखल बढ़ता जा रहा है, तो स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभाव भी तेज़ी से बढ़े हैं.
हालत ये है कि आज भारतीय परिवार न सिर्फ़ पारंपरिक मिठाइयाँ खाते हैं, बल्कि केक, बिस्किट, आइसक्रीम, चॉकलेट और शेक के साथ ही बेकरी और पैकेज्ड चीज़ों में भी चीनी का बेहिसाब उपयोग कर रहे हैं.
एक सर्वे के अनुसार, 56% शहरी परिवार हर महीने तीन या इससे ज्यादा बार मीठे उत्पादों का सेवन करते हैं, जबकि 18% लोग रोजाना मिठाइयाँ खाते हैं.
इस बढ़ते चलन का असर चीनी की खपत पर भी साफ दिख रहा है. भारत की सालाना चीनी खपत अब लगभग 290 लाख मीट्रिक टन पहुँच गई है, जबकि 2019-20 में यह 280 लाख मीट्रिक टन थी.
लेकिन वैज्ञानिक बता रहे हैं कि यह महज चीनी की खपत नहीं है, यह ज़हर की खपत है.
ह्रदय रोग से लेकर कैंसर तक
Centers for Disease Control and Prevention की एक रिपोर्ट बताती है कि अभी भी दुनिया भर में सबसे ज़्यादा मौतों के लिए ह्रदय रोग ज़िम्मेवार है और अध्ययन बताते हैं कि चीनी युक्त आहार इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.
वैज्ञानिक मानते हैं कि अधिक मात्रा में चीनी का सेवन लीवर पर वैसा ही असर डालता है जैसा बहुत शराब पीने का असर होता है.
असल में चीनी में पाया जाने वाला उच्च फ्रुक्टोज़ वसा में बदल जाता है और लीवर में जमा होने के बाद नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग में बदल जाता है.
अधिक चीनी के उपयोग से इंसुलिन प्रतिरोध पैदा होता है. यह बात साफ हो चुकी है कि रक्त में ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा विषाक्त हो सकती है.
जिससे टाइप 2 डाइबिटीज होता है. यहां तक कि वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि चीनी के सेवन से इंसुलिन का स्तर बढ़ जाता है.
ऐसे में शरीर अवांछित कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि और गुणन को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता है, जिससे कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है.
मीठे पेय पदार्थ यानी सॉफ्ट ड्रिंक्स से मिलने वाली चीनी हमारे शरीर को भूख का सही संकेत नहीं देती, जिससे लोग अनजाने में ज्यादा कैलोरी खा लेते हैं और मोटापे का शिकार होते हैं.
बचपन में चीनी न दें
शोध बताते हैं कि जिन बच्चों को जीवन के शुरुआती चार सालों तक चीनी नहीं मिला, वयस्क अवस्था में उन्हें मधुमेह और उक्त रक्तचाप से बचाया जा सकता है.
अभी पिछले ही साल राष्ट्रीय पोषण संस्थान और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने पहली बार अलग-अलग तरह के ड्रिंक्स, आइसक्रीम, बच्चों के पौष्टिक खाद्य पदार्थ, बिस्किट, पैकेज्ड फूड्स और ड्रिंक्स में चीनी की मात्रा के लिए सीमा तय करने की सिफारिश की थी.
चीनी के अतिरिक्त सेवन से बचें
सवाल ये भी उठता है कि क्या चीनी खाना सेहत के लिए सच में इतना हानिकारक है? इसका जवाब अलग-अलग वैज्ञानिकों के पास सर्वथा अलग-अलग है.
Harvard Health Publishing की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य के मामले में चीनी की छवि कुछ कड़वी और कुछ मीठी है.
वैसे तो फल, सब्ज़ी, अनाज और दूध जैसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में भी शर्करा पाई जाती है.
इनका सेवन फायदेमंद होता है, क्योंकि इनमें फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट जैसे ज़रूरी तत्व भी मौजूद होते हैं. ये चीज़ें शरीर में धीरे-धीरे पचती हैं और हमें लगातार ऊर्जा देती हैं.
समस्या तब शुरू होती है, जब हम ज़रूरत से ज़्यादा "अतिरिक्त चीनी" का सेवन करने लगते हैं- यानी वो चीनी जो खाने को मीठा और ज़्यादा टिकाऊ बनाने के लिए मिलाई जाती है.
अमरीका में ही शुगर एसोसिएशन का दावा है कि एक सिमित मात्रा में चीनी का उपयोग नुकसान नहीं पहुंचाता.
लेकिन कोशिश तो ये की ही जा सकती है कि प्राकृतिक रुप से जो मीठास उपलब्ध है, उसका ही उपयोग किया जाए और अतिरिक्त चीनी या बाहरी चीनी से बचा जाए.