क्या NATO सैन्य संगठन आज भी प्रासंगिक है?
नई दिल्ली । डेस्क: डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो से अमेरिकी वापसी की हालिया धमकियों ने दुनिया भर के नीति-नियंताओं को इस बुनियादी सवाल पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर इस सैन्य गठबंधन का भविष्य क्या है. वास्तविकता यह है कि नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां उसकी उपयोगिता और अस्तित्व दोनों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
जब 1949 में इस गठबंधन की नींव रखी गई थी, तब इसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था सोवियत संघ के विस्तारवाद को रोकना और पश्चिमी यूरोप को सुरक्षा कवच प्रदान करना. लेकिन 1991 में सोवियत संघ के बिखरने और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, नाटो के अस्तित्व का मूल आधार ही समाप्त हो गया था.
कायदे से इस संगठन को उसी समय भंग हो जाना चाहिए था, लेकिन इसे भंग करने के बजाय इसका विस्तार किया गया. यही वह बिंदु है जहां से नाटो के वर्तमान संकट की जड़ें शुरू होती हैं.
सोवियत संघ के जाने के बाद, नाटो ने अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए कृत्रिम रूप से नए दुश्मनों और मिशनों की तलाश शुरू की. गठबंधन ने न केवल पूर्व की ओर विस्तार किया, बल्कि अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर अंतरराष्ट्रीय पुलिस की भूमिका निभाने की कोशिश की.
आज जब नाटो के भीतर से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विस्तार करने या चीन के खिलाफ एक 'आर्थिक नाटो' बनाने की आवाजें उठती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सैन्य गठबंधन अब रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक और दिशाहीन हो चुका है.
एक ऐसा सैन्य संगठन, जिसे जीवित रहने के लिए हर दशक में एक नए दुश्मन की जरूरत पड़ती है, स्वाभाविक रूप से आंतरिक अंतर्विरोधों से घिर जाता है. वर्तमान में नाटो के सदस्य देशों के बीच हितों का टकराव इतना गहरा है कि साझा मूल्यों की बात अब केवल कागजों तक सीमित रह गई है.
रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष ने नाटो की इस आंतरिक कमजोरी को सतह पर ला दिया है. जबकि अमेरिका सात समंदर पार बैठकर इस युद्ध के माध्यम से अपनी रणनीतिक बिसात बिछा रहा है, यूरोपीय देशों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है.
ऊर्जा की आसमान छूती कीमतें, औद्योगिक पलायन और शरणार्थियों का संकट यूरोप की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रहा है. यूरोपीय देशों के भीतर अब यह कड़वा सच स्वीकार किया जाने लगा है कि वे अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं के लिए अपनी आर्थिक स्थिरता की बलि दे रहे हैं.
ईरान के साथ हालिया तनाव में जब ब्रिटेन जैसे अमेरिका के सबसे कट्टर सहयोगियों ने भी सैन्य भागीदारी से इनकार कर दिया, तो यह साफ हो गया कि अब वाशिंगटन के आदेशों पर आंख मूंदकर चलना किसी के लिए भी संभव नहीं है.
डोनाल्ड ट्रंप का 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा किसी व्यक्ति की सनक नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती आंतरिक परिस्थितियों का परिणाम है. अमेरिका पर आज 36 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज है और वह अपने रक्षा बजट से ज्यादा पैसा ब्याज चुकाने में खर्च कर रहा है.
ऐसी स्थिति में अमेरिकी जनता अब इस पक्ष में नहीं है कि उनके टैक्स का पैसा दुनिया भर में सैन्य ठिकाने चलाने के लिए खर्च किया जाए.
अमेरिका का मध्यम वर्ग खोखला हो चुका है और इराक-अफगानिस्तान जैसी विफलताओं ने विदेशों में हस्तक्षेप की राजनीतिक साख को खत्म कर दिया है. जब अमेरिका खुद अपने भीतर से टूट रहा हो, तो वह एक वैश्विक गठबंधन का नेतृत्व कैसे कर सकता है?
चीन के खिलाफ एक आर्थिक मोर्चा बनाने की नाटो की कोशिशें भी हताशा भरी लगती हैं. चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र है. नाटो के अधिकांश सदस्य देश चीन के साथ गहरे व्यापारिक रिश्तों में बंधे हैं. ऐसे में चीन के साथ लंबे आर्थिक युद्ध की तैयारी नाटो देशों के लिए आत्मघाती साबित होगी.
इतिहास साक्षी है कि जब किसी महान शक्ति के आंतरिक अंतर्विरोध और आर्थिक गिरावट एक सीमा से बाहर चले जाते हैं, तो वह अपने वैश्विक दायित्वों को अनिश्चित काल तक नहीं निभा पाती.
नाटो का मौजूदा संकट इसी ऐतिहासिक सत्य का हिस्सा है. सोवियत संघ के अंत के साथ ही नाटो की उम्र पूरी हो चुकी थी, और अब हम जो देख रहे हैं, वह केवल एक ऐसे ढांचे का ढहना है जो समय के साथ अपनी उपयोगिता खो चुका है. ट्रंप ने केवल उस सच्चाई को आवाज दी है, जिसे वैश्विक राजनीति लंबे समय से नजरअंदाज कर रही थी.