इस्लामाबाद वार्ता पर ईरानी मीडिया: तेहरान टाइम्स का कड़ा रुख
तेहरान । डेस्क: क्षेत्रीय तनाव के बीच पाकिस्तान की राजधानी में आयोजित दूसरे दौर की वार्ता भले ही कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय रही हो, लेकिन ईरानी मीडिया और विशेष रूप से 'तेहरान टाइम्स' ने इस प्रक्रिया को लेकर कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है. तेहरान की ओर से यह संदेश साफ है कि बातचीत में प्रगति न होने का एकमात्र कारण वाशिंगटन का वह "अत्यधिक, अवास्तविक और अस्वीकार्य" रवैया है, जो जमीनी हकीकत को स्वीकार करने में विफल रहा है. ईरानी मीडिया के अनुसार, 11 अप्रैल की इस्लामाबाद बैठक एक ऐसे समय में हुई जब कुछ ही दिनों पहले दो सप्ताह का संघर्षविराम समाप्त हुआ था, जो फरवरी में शुरू हुए अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान को रोकने के लिए लगाया गया था.
कूटनीति के बीच अमेरिकी 'विश्वासघात' का आरोप
ईरानी मीडिया ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर समझौते से मुकरने का गंभीर आरोप लगाया है. लेखों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने शुरुआत में ईरान की व्यापक 10-सूत्रीय योजना को स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद युद्धविराम हुआ था. हालांकि, बाद में उन्होंने इस समझौते को दरकिनार करते हुए ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी. तेहरान टाइम्स ने इसे कूटनीति में "बदनीयती" का प्रमाण बताया है. ईरान ने इस नाकाबंदी को सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा माना है और अपनी संप्रभुता के प्रदर्शन के रूप में रणनीतिक जलडमरूमध्य, होर्मुज को अपने विरोधियों के लिए बंद कर दिया है. ईरान का तर्क है कि जब अमेरिका समुद्र की स्वतंत्रता के अंतरराष्ट्रीय कानूनों (UNCLOS) का उल्लंघन कर रहा है, तो तेहरान को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रक्षात्मक कदम उठाने का पूरा अधिकार है.
परमाणु संप्रभुता और यूरेनियम संवर्धन का सवाल
वार्ता की विफलता के पीछे एक प्रमुख स्तंभ अमेरिका की वह मांग है जिसमें वह ईरान से अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करने को कह रहा है. ईरानी मीडिया इसे देश के "अपरिहार्य अधिकार" के खिलाफ मानता है. तेहरान का कहना है कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अनुच्छेद IV के तहत उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा विकसित करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है. इसके साथ ही, अमेरिका द्वारा 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम के भंडार को देश से बाहर भेजने की मांग को भी ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया है. तेहरान के लिए यह भंडार उसकी स्वदेशी तकनीकी क्षमता का प्रतीक है और भविष्य में पश्चिमी देशों द्वारा समझौतों से पलटने के खिलाफ एक ठोस गारंटी के रूप में कार्य करता है.
सैन्य टकराव और क्षेत्रीय शक्ति का बदलता संतुलन
ईरानी मीडिया ने हालिया संघर्ष के दौरान अपनी सैन्य सफलता का जमकर प्रचार किया है. रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी सशस्त्र बलों ने अमेरिकी ठिकानों और इजरायली रणनीतिक स्थलों पर मिसाइलों और ड्रोनों की 100 से अधिक लहरों के साथ हमले किए. तेहरान का दावा है कि ट्रंप प्रशासन इन हमलों से हुए नुकसान को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी सेना को मिले "गंभीर झटकों" की पुष्टि की है. ईरान का मानना है कि इस सैन्य शक्ति और कूटनीतिक कौशल ने ही अमेरिका को मेज पर आने के लिए मजबूर किया है.
क्षेत्रीय राजनीति और विदेशी प्रभाव
ईरानी दृष्टिकोण में इस पूरे संघर्ष के पीछे इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका को बेहद नकारात्मक बताया गया है. तेहरान टाइम्स के अनुसार, नेतन्याहू अपने घरेलू राजनीतिक संकट और भ्रष्टाचार के मामलों से ध्यान भटकाने के लिए ट्रंप प्रशासन को उकसा रहे हैं. लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि अमेरिकी सैन्य जमावड़ा और तीसरे विमान वाहक पोत, यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश की तैनाती यह दर्शाती है कि वाशिंगटन वास्तविक कूटनीति के बजाय सैन्य दबाव को प्राथमिकता दे रहा है.
वैश्विक प्रतिक्रिया और तेहरान की 'रेड लाइन्स'
दिलचस्प बात यह है कि ईरानी मीडिया ने जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के उस बयान को भी प्रमुखता दी है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान उम्मीद से कहीं अधिक मजबूत है और बहुत कुशलता से बातचीत कर रहा है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची की हालिया पाकिस्तान, ओमान और रूस की यात्राओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान अपनी "रेड लाइन्स" पर कोई समझौता नहीं करेगा. तेहरान का स्पष्ट रुख है कि वार्ता केवल आपसी सम्मान और सभी प्रकार के दबावों एवं नाकाबंदी को हटाने की शर्त पर ही आगे बढ़ सकती है. कुल मिलाकर, ईरानी मीडिया इस बात पर जोर दे रहा है कि पश्चिम एशिया में एकतरफा फरमान चलाने का दौर अब समाप्त हो चुका है.