ईरान-इजरायल युद्ध: 'मजहबी जंग' के नैरेटिव से दुनिया में बढ़ी चिंता
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान और इजरायल के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है, लेकिन इस युद्ध के मैदान से कहीं अधिक खतरनाक इसके इर्द-गिर्द बुनी जा रही 'धार्मिक युद्ध' की पटकथा नजर आ रही है. शनिवार को शुरू हुए इस हमले के बाद से अमेरिका और इजरायल के शीर्ष नेताओं द्वारा जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा है, उसने मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक विचारकों के माथे पर बल डाल दिए हैं.
वॉशिंगटन से लेकर यरूशलेम तक, इस सैन्य अभियान को एक रणनीतिक लड़ाई के बजाय 'ईश्वरीय योजना' और 'धर्मयुद्ध' के रूप में पेश करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. मुस्लिम नागरिक अधिकार संगठन 'काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस' (CAIR) ने पेंटागन और अन्य नेताओं की इस बयानबाजी की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे बेहद खतरनाक और मुस्लिम विरोधी करार दिया है.
इस विवाद की जड़ में अमेरिका के एक वॉचडॉग 'मिलिट्री रिलिजियस फ्रीडम फाउंडेशन' (MRFF) की वह रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि अमेरिकी सैनिकों को यह बताया जा रहा है कि ईरान के खिलाफ यह युद्ध 'बाइबिल के अंत समय' यानी 'आर्मगेडन' (महाप्रलय) की शुरुआत है.
रिपोर्ट के अनुसार, एक सैन्य कमांडर ने अपने सैनिकों से कहा कि यह सब 'ईश्वर की दिव्य योजना' का हिस्सा है और उन्होंने इसके लिए 'बुक ऑफ रेवलेशन' का हवाला भी दिया. इतना ही नहीं, यह भी दावा किया गया कि राष्ट्रपति ट्रंप को ईसा मसीह द्वारा ईरान में इस आग को प्रज्वलित करने के लिए चुना गया है ताकि धरती पर उनके पुनरागमन का मार्ग प्रशस्त हो सके.
सैन्य बलों के भीतर इस तरह की कट्टरपंथी धार्मिक विचारधारा का प्रसार न केवल अमेरिकी सैन्य अनुशासन के खिलाफ है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए भी एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है.
सार्वजनिक मंचों पर भी भाषा की मर्यादा टूटती दिख रही है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान के नेतृत्व को 'धार्मिक कट्टरपंथी पागल' बताया है, जबकि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने ईरान के शासन को 'भविष्यवाणी के इस्लामिक भ्रम' से ग्रस्त करार दिया. 'काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस' का मानना है कि हेगसेथ की यह टिप्पणी शिया संप्रदाय की उन मान्यताओं पर सीधा हमला है जो अंत समय में पवित्र विभूतियों के आगमन से जुड़ी हैं.
दूसरी ओर, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संघर्ष को यहूदी धर्मग्रंथ 'टोराह' से जोड़ते हुए ईरान की तुलना 'अमालेक' से कर दी है. यहूदी परंपरा में 'अमालेक' को परम बुराई का प्रतीक माना जाता है, जिसे पूरी तरह नष्ट करने का आदेश दिया गया है. नेतन्याहू द्वारा इस प्राचीन शत्रु का संदर्भ लेना यह संकेत देता है कि यह लड़ाई केवल सीमाओं की नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान की है.
जानकारों का मानना है कि इस तरह की भाषा का इस्तेमाल घरेलू स्तर पर जनता को लामबंद करने और एक जटिल भू-राजनीतिक संघर्ष को 'अच्छाई बनाम बुराई' के सरल नैतिक नाटक में बदलने के लिए किया जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि जब किसी युद्ध को 'पवित्र' या 'मजहबी' घोषित कर दिया जाता है, तो वहां शांति और समझौते की गुंजाइश खत्म हो जाती है.
डरहम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जोलियन मिचेल और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के इब्राहिम अबुशरीफ जैसे विद्वानों का कहना है कि यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है. इसके जरिए ईसाई जायोनी और कट्टरपंथी मतदाताओं को जोड़ा जाता है, जो मध्य पूर्व के संघर्षों को धार्मिक भविष्यवाणियों के चश्मे से देखते हैं.
हालांकि, इतिहास गवाह है कि ऐसी शब्दावली के परिणाम घातक होते हैं. जॉर्ज डब्लू. बुश द्वारा 9/11 के बाद इस्तेमाल किए गए 'क्रूसेड' शब्द ने जो जख्म दिए थे, वे आज भी हरे हैं.
वर्तमान में ईरान और इजरायल के बीच का तनाव भले ही शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय प्रभुत्व का खेल हो, लेकिन इसे धार्मिक रंग देने से यह संघर्ष एक ऐसी दिशा में जा सकता है जहां से वापसी का रास्ता नहीं बचेगा. मानवीय संकट के बीच इस 'मजहबी युद्ध' के नैरेटिव ने कूटनीति के दरवाजे लगभग बंद कर दिए हैं.