इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी असंवेदनशील और हैरान करने वाली-सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली | डेस्क: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फ़ैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि कहा था कि पीड़िता के स्तन को छूना और पायजामा की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले की देश भर में आलोचना हुई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने, इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले पर एनजीओ 'वी द वूमेन ऑफ इंडिया' की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लिया था.
अब बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फ़ैसला पूरी तरह से असंवेदनशीलता और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है.
अदालत ने कहा- हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस विवादित फ़ैसले में की गईं कुछ टिप्पणियां, खासतौर पर पैरा 21, 24 और 26, फ़ैसला लिखने वाले की संवेदनशीलता की कमी को दिखाता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फ़ैसला ‘हैरान’ करने वाला था. अदालत ने कहा कि चूंकि टिप्पणियां "कानून के सिद्धांतों से पूरी तरह अनजान हैं और पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं", इसलिए टिप्पणियों पर रोक लगाना मजबूरी है.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के कासगंज इलाके में 2021 में एक 11 साल की नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश हुई थी. आरोपी पवन और आकाश ने 11 वर्षीय पीड़िता के स्तनों को पकड़ा और उनमें से एक आकाश ने उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ दिया और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की. इसे यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 के दायरे में बलात्कार के प्रयास या यौन उत्पीड़न के प्रयास का मामला पाते हुए, संबंधित ट्रायल कोर्ट ने POCSO अधिनियम की धारा 18 (अपराध करने का प्रयास) के साथ धारा 376 को लागू किया और इन धाराओं के तहत समन आदेश जारी किया.
इसके बाद आरोपियों ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाख़िल की थी. जिस पर हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह विवादास्पद टिप्पणी की थी.