भारत में अब निजी कंपनियां भी लगा सकेंगी जंगल
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में निजी कंपनियां अब राज्य सरकारों के साथ मिलकर जंगल लगा सकेंगी. भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत 2 जनवरी को नई गाइडलाइन जारी कर देश के खराब हो चुके वन क्षेत्रों (Degraded Forest Land) को फिर से हरा-भरा करने के लिए निजी संस्थाओं के प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया है.
अब तक वनीकरण और पारिस्थितिक बहाली का कार्य विशेष रूप से केवल सरकारी विभाग ही करते थे, लेकिन इस नए कानूनी ढांचे के तहत अब गैर-सरकारी संस्थाएं और निजी कंपनियां भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर इन क्षेत्रों में पौधरोपण और बहाली का कार्य कर सकेंगी.
सरकार का तर्क है कि इस 'सार्वजनिक-निजी भागीदारी' से भारत के हरित क्षेत्र को बढ़ाने के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी और वन प्रबंधन में आधुनिक तकनीकों व संसाधनों का समावेश होगा.
इस नई नीति के तहत निजी संस्थाओं को बड़े वित्तीय लाभ भी दिए गए हैं. नियम के अनुसार, राज्य वन विभाग की देखरेख और स्वीकृत 'वर्किंग प्लान' के तहत किए जाने वाले इन कार्यों को वानिकी गतिविधि ही माना जाएगा, जिसके कारण कंपनियों को पर्यावरण शुल्क या 'नेट प्रेजेंट वैल्यू' (NPV) और प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की भारी-भरकम राशि का भुगतान नहीं करना पड़ेगा.
जहां सरकार इसे एक क्रांतिकारी कदम मान रही है, वहीं पर्यावरणविद और कानूनी विशेषज्ञ इसे वनों के 'व्यावसायिक उपयोग' की शुरुआत मानकर चिंता जता रहे हैं.
पर्यावरणविद् और वकील ऋत्विक दत्ता का मानना है कि यह नीति प्राकृतिक जंगलों को 'प्लांटेशन' (वृक्षारोपण) में बदल सकती है. उन्होंने आगाह किया कि कंपनियां मुनाफे के लिए अक्सर एक ही प्रजाति के व्यावसायिक पेड़ लगाती हैं, जबकि प्राकृतिक जंगल घास के मैदानों, झाड़ियों और विभिन्न प्रकार की वृक्ष प्रजातियों से समृद्ध होते हैं.
इसी तरह, पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे वन प्रबंधन के निजीकरण की कोशिश बताते हुए सरकार की आलोचना की है. हालांकि, विक्रांत तोंगड़ जैसे कुछ संरक्षणवादियों का कहना है कि यदि यह कदम स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो यह सकारात्मक हो सकता है, बशर्ते वन विभाग यह सुनिश्चित करे कि वन भूमि का उपयोग किसी गैर-वानिकी कार्य के लिए न हो.
फिलहाल, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें इस नई शक्ति का उपयोग पारिस्थितिकी को बचाने के लिए करती हैं या केवल व्यावसायिक लाभ के लिए.