भारत में मानसिक समस्या से 20 करोड़ लोग प्रभावित- लैंसेट
नई दिल्ली । डेस्क: लैंसेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 20 करोड़ लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. 2020 के बाद, 17-24 वर्ष की आयु वर्ग में हर सात में से एक व्यक्ति अवसाद, चिंता, और उत्साहहीनता से ग्रस्त है. मनोवैज्ञानिक रंजन भट्टाचार्य के अनुसार, 2015-16 में शुरू हुए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में पाया गया कि देश की लगभग 15% आबादी चिंता या ओसीडी (ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर) जैसी समस्याओं से पीड़ित है, और 1% लोग स्किज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसे गंभीर मानसिक रोगों से प्रभावित हैं.
रंजन कहते हैं, “143 करोड़ की आबादी में एक करोड़ से अधिक लोग गंभीर मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं.” हालांकि, सरकार इस संकट से अवगत है, लेकिन स्वास्थ्य बजट का केवल 1-2% ही मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च होता है, जो इस क्षेत्र को उपेक्षित बनाता है.
वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट्स, वर्ल्ड मेंटल हेल्थ टुडे और मेंटल हेल्थ एटलस 2024, ने भी वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है. इनके अनुसार, दुनिया भर में 100 करोड़ से अधिक लोग विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं.
महामारी ने लोगों के दैनिक जीवन को बदल दिया है. नौकरी छूटने, अपनों के खोने, और असुरक्षा की भावना ने मानसिक तनाव और अवसाद को बढ़ाया है.
मनोवैज्ञानिक अनुत्तमा बनर्जी कहती हैं, “लोग ठीक नहीं हैं. हम जो मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हैं, वे इसकी गंभीरता रोज़ देखते हैं. आपसी हिंसा और असहिष्णुता हमारी मानसिक चोट को और गहरा कर रही है. कोई भी ठीक नहीं है, लेकिन एक व्यक्ति का दुख दूसरों के साथ नहीं बंट रहा. यह एक गहरी संकट की स्थिति है.” उनके अनुसार, यह हिंसा केवल युद्ध या सीमा तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया पर भी आक्रामकता दिखती है, जो लोगों की बढ़ती हमलावर प्रवृत्ति को दर्शाती है.
अनुत्तमा कहती हैं, “हम अपनी सुरक्षा के लिए दीवारें खड़ी कर रहे हैं, लेकिन इससे हम और कमज़ोर हो रहे हैं. यह व्यवहार हमारी पीड़ा का समाधान नहीं, बल्कि और बड़ा कारण बन रहा है.”
रिपोर्ट के अनुसार, 20-29 वर्ष की आयु के लोग सबसे अधिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं, और 2011 के बाद से यह प्रवृत्ति बढ़ रही है. सबसे आम समस्याएं चिंता (एंग्जाइटी) और अवसाद (डिप्रेशन) हैं. अनुत्तमा बताती हैं कि चिंता और अवसाद के बीच अंतर है.
चिंतित व्यक्ति अशांत रहकर समाधान की तलाश करता है, जबकि अवसाद व्यक्ति को निष्क्रिय बना देता है, जिससे उसे लगता है कि कोई भी प्रयास व्यर्थ है.
विशेषज्ञों का सुझाव है कि मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने के लिए जिला-स्तरीय कार्यक्रमों का विस्तार करना होगा. साथ ही, गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों को और बढ़ावा देना ज़रूरी है, जो पूरे भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहे हैं. मानसिक रोगों से निपटने का पहला कदम है लोगों में आशा जगाना.