भारत में 85 फीसदी मनोरोगियों तक नहीं पहुँच पा रहा इलाज- IPS
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में अधिकांश मानसिक रोगियों को चिकित्सा नहीं मिल पाती है. भारतीय मनोरोग सोसायटी (IPS) ने देश में मानसिक स्वास्थ्य उपचार के भारी अंतर (ट्रीटमेंट गैप) पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि भारत में मनोरोगों से जूझ रहे लगभग 80 से 85 प्रतिशत व्यक्तियों को समय पर या उचित चिकित्सा सहायता नहीं मिल पा रही है.
दिल्ली के यशोभूमि में 28 से 31 जनवरी तक आयोजित होने वाले 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन (ANCIPS 2026) के कर्टन-रेजर कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि उपचार में प्रगति और बढ़ती जागरूकता के बावजूद, आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी औपचारिक स्वास्थ्य प्रणाली से बाहर है.
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में यह अंतराल दुनिया में सबसे अधिक है, जहाँ सामान्य मानसिक विकारों से पीड़ित 85 प्रतिशत से अधिक लोग इलाज नहीं कराते हैं.
IPS की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि मानसिक बीमारियाँ सबसे अधिक उपचार योग्य स्थितियों में से हैं, लेकिन सामाजिक कलंक (स्टिग्मा), जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकरण के अभाव के कारण लोग चुपचाप पीड़ित बने रहते हैं.
उन्होंने इसे केवल एक चिकित्सा मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती बताया.
सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष और इहबास (IHBAS) के पूर्व निदेशक डॉ. निमेष जी. देसाई ने उपचार में देरी के गंभीर परिणामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इलाज न मिलने से बीमारी पुरानी और गंभीर हो जाती है, जिससे उत्पादकता की हानि, पारिवारिक संकट और आत्महत्या का जोखिम बढ़ जाता है.
आंकड़ों के अनुसार, यह समस्या बच्चों और बुजुर्गों में और भी गंभीर है, जहाँ लगभग 80 से 84 प्रतिशत जरूरतमंदों तक मदद नहीं पहुँचती. हालांकि टेली-मानस (Tele-MANAS) जैसी पहल सकारात्मक कदम हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही प्राथमिकता और बजट आवंटित करना अनिवार्य है ताकि इस खाई को पाटा जा सके.