भारत की 7.8% GDP वृद्धि दर: आर्थिक मजबूती या आंकड़ों का हेरफेर?
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान युद्ध के प्रभावों और प्रतिकूल मौसम की दोहरी मार के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की उल्लेखनीय जीडीपी (GDP) विकास दर हासिल की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन आंकड़ों को देश की तीव्र प्रगति और सकारात्मक दिशा का प्रमाण बताते हुए निराशाजनक आख्यानों को खारिज किया है. हालांकि, इस 'हेर्कुलियन' विकास दर के बीच बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, घटती बचत, कमजोर क्रय शक्ति और विदेशी निवेशकों की निकासी जैसे आंकड़े अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं.
विख्यात अर्थशास्त्रियों और पूर्व अधिकारियों ने इस विकास दर की गणना पद्धति और वास्तविक धरातल पर इसके प्रभाव पर चिंता जताई है. 'इंसिग्निया पॉलिसी रिसर्च' के संस्थापक और प्रबंध निदेशक अभिषेक आनंद ने इन आंकड़ों को सावधानी से देखने की सलाह दी है. उनका कहना है कि यह विकास दर काफी हद तक औपचारिक क्षेत्र के सीमित आंकड़ों पर आधारित है. अनौपचारिक क्षेत्र के संपूर्ण आंकड़े आने के बाद इसमें संशोधन हो सकता है और अंतिम आंकड़ा नीचे आ सकता है.
जीडीपी गणना और संशोधनों पर उठते गंभीर सवाल
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने पिछले वर्ष के जीडीपी आंकड़ों में किए गए संशोधनों पर सवाल उठाए हैं. उनके अनुसार, पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मौजूदा मूल्यों पर जीडीपी अनुमान को 86 ट्रिलियन रुपये से घटाकर 80 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया. इस 6 ट्रिलियन रुपये की भारी कटौती के कारण इस वर्ष की पहली तिमाही की नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर 10.3 प्रतिशत दिखाई दे रही है. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आंकड़े हमेशा बाद में मिलने वाली बेहतर जानकारी के आधार पर संशोधित होते हैं.
गणना पद्धति का एक और बड़ा विवाद जीडीपी डिफ्लेटर (GDP Deflator) को लेकर है. नाममात्र जीडीपी (10.3%) और वास्तविक जीडीपी (7.8%) के बीच का अंतर केवल 2.3 प्रतिशत का मुद्रास्फीति अंतर दर्शाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, डिफ्लेटर का मान थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के बीच होना चाहिए था. सरकार का तर्क है कि कच्चे तेल जैसे आयातित सामानों की ऊंची कीमतें थोक सूचकांक को तो बढ़ाती हैं, लेकिन जीडीपी गणना में आयात घटा दिया जाता है, जिससे डिफ्लेटर कम रहता है.
औपचारिक बनाम अनौपचारिक क्षेत्र का असंतुलन
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी विकास दर के वास्तविक लाभों पर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने पूछा कि यदि देश इतनी तेजी से बढ़ रहा है, तो पर्याप्त और अच्छे रोजगार क्यों नहीं पैदा हो रहे? उद्योगपति नया निवेश करने से क्यों कतरा रहे हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में सुस्ती क्यों है? राजन ने चेतावनी दी है कि यदि पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं हुए तो भारत अपने 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) का अवसर गंवा देगा.
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के रिसर्च पेपर के अनुसार, 2016 के बाद से औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र एक साथ नहीं चल रहे हैं. नोटबंदी, जीएसटी और कोविड महामारी की सबसे बड़ी मार अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ी है. ऐसे में केवल औपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों को पूरे देश का प्रतिनिधि मान लेना सटीक तस्वीर पेश नहीं करता.
आम जनता पर महंगाई की मार और घटती बचत
भारतीय सांख्यिकी संस्थान के प्रोफेसर अभिजीत सरकार का कहना है कि भारत की लगभग 80 प्रतिशत आबादी अनौपचारिक क्षेत्र में लगी है, जो स्थिर वेतन और सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है. जब तक विनिर्माण क्षेत्र में सुधार नहीं होता, तब तक यह विकास व्यापक समृद्धि में नहीं बदलेगा. अगस्त में भारत का विनिर्माण पीएमआई (PMI) भी गिरकर पांच साल के निचले स्तर 52.8 पर आ गया है.
कागजी विकास और आम परिवार के बजट के बीच का अंतर साफ नजर आ रहा है. कोलकाता के कई परिवारों के अनुसार, बच्चों की स्कूल फीस और घरेलू सामानों के खर्च में हर साल भारी बढ़ोतरी हो रही है. आम परिवारों की सालाना आय और बचत में गिरावट आ रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है.