भारत में कैंसर से ज़्यादा सेप्सिस से मौतें
छत्तीसगढ़ समेत देश भर में सेप्सिस से होने वाली मौतें बेहद चिंताजनक है
रायपुर | डेस्कः छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्यों में हुए शोध से यह बात सामने आई है कि भारत में कैंसर से भी ज्यादा मौतें सेप्सिस से हो रही हैं.
हर 10 में से 3 लोगों की मौत इस सेप्सिस बीमारी से हो रही हैं.
हालांकि भारत में इसे लेकर कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है.
लेकिन सबसे बड़ा संकट ये है कि न तो लोगों को सेप्सिस के बारे में जानकारी है और ना ही जागरूकता.
चेस्ट जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि भारत में सेप्सिस का बोझ काफी ज्यादा है.
सेप्सिस एक खतरनाक मेडिकल इमरजेंसी है, जो तब होती है जब शरीर किसी संक्रमण से लड़ते हुए ज़रूरत से ज़्यादा रसायन छोड़ता है. जिससे पूरे शरीर में सूजन आ जाती है.
इस स्थिति में अगर समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा साबित हो सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)के अनुसार, सेप्सिस के लक्षणों में तेज़ या बहुत कम बुखार, तेज दिल की धड़कन, तेज़ साँस लेना, भ्रम की स्थिति और शरीर में तेज़ दर्द शामिल है.
छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में हुए शोध से पता चला कि अकेले 2017 में भारत में ही हर 10 में से 3 मौतें सेप्सिस की वजह से हुई हैं. वहीं द लैंसेट जर्नल के अनुसार भारत में नवजात शिशुओं में भी सेप्सिस पर हुए शोध में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं.
दुनिया भर के आंकड़ों की बात करें तो पता चलता है कि 2020 में दुनिया भर में हर पाँच में से एक मौत सेप्सिस की वजह से हुई.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल करीब 1.1 करोड़ लोग सेप्सिस के कारण अपनी जान गंवाते हैं. जबकि कैंसर से मरने वालों की तादात 97 लाख है, जो कि सेप्सिस से मरने वालों की तुलना में कम है.
कमोबेश भारत में भी स्थिति गंभीर है. 2017 में देश में हुई कुल मौतों में से लगभग 30% का कारण सेप्सिस था.
भारत के अस्पतालों में सेप्सिस के बढ़ते मामलों को लेकर कई अध्ययनों में चिंता जताई गई है. 2022 में जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारत के 35 आईसीयू में भर्ती 680 मरीजों में से हर दूसरा मरीज सेप्सिस से पीड़ित था और उनमें से 27.6% की मौत हो गई.
2023 में इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन की कोलकाता शाखा के एक अध्ययन में भी चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए. शहर के सात अस्पतालों में भर्ती 224 आईसीयू मरीजों में से 30% को सेप्सिस था, जिससे उनकी हालत और गंभीर हो गई.
इनमें से आधे मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने के दौरान सेप्सिस हुआ, जबकि बाकी को यह संक्रमण अस्पताल में आने से पहले हो चुका था.
भारत में सेप्सिस का बढ़ता खतरा स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है. इस घातक संक्रमण से न सिर्फ बड़े बल्कि नवजात शिशु भी खतरे में हैं.
दरअसल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली और रायपुर के शोधकर्ताओं सहित दूसरे शोधार्थियों ने कहा कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों के जिला अस्पतालों से नवजात शिशुओं में सेप्सिस के आंकड़े हालांकि बेहद दुर्लभ हैं.
हेल्थ जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित शोध के अनुसार 6,600 से अधिक नवजात शिशुओं के डेटा का विश्लेषण करने वाले इस अध्ययन में पाया गया कि अस्पतालों में सेप्सिस के कुल मामले केवल 0.6 से 10 प्रतिशत के बीच थे.
लेकिन भारत के पांच जिला अस्पतालों में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि सेप्सिस से पीड़ित हर तीन में से एक नवजात शिशु की मौत हो सकती है.
अध्ययन में 6612 नवजात शिशुओं को शामिल किया गया. लगभग 3.2% में सेप्सिस था. अन्य अस्पतालों में पैदा हुए शिशुओं (5.0%) की तुलना में उसी अस्पताल में पैदा हुए शिशुओं (2.0%) में अधिक मामले थे. यहां मृत्यु दर 36.6% थी.
अधिकांश संक्रमण क्लेब-सिएला न्यूमोनिया, ई. कोलाई और एंटरो-बैक्टर एस-पीपी के कारण हुए. इनमें से कई बैक्टीरिया (75%-88%) पर आम एंटीबायोटिक दवाओं का कोई असर ही नहीं हुआ.
यह रिसर्च भारत के कई प्रमुख चिकित्सा संस्थानों ने मिलकर की, जिनमें AIIMS रायपुर, एम्स नई दिल्ली, भारत जवाहरलाल स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा संस्थान और अनुसंधान, पुडुचेरी, सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, चंडीगढ़, असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़, AIIMS जोधपुर, क्लिनिकल डेवलपमेंट सर्विसेज एजेंसी, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस और प्रौद्योगिकी संस्थान, फरीदाबाद को शामिल किया गया था.
विशेषज्ञों का कहना है कि सेप्सिस नवजात शिशुओं के लिए एक गंभीर खतरा है. खासकर जब यह दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी बैक्टीरिया से होता है. संक्रमण को रोकने के लिए बेहतर अस्पताल सुविधाएं, स्वच्छता और प्रभावी एंटीबायोटिक नीतियां जरूरी हैं.
सेप्सिस का संक्रमण खतरनाक क्यों?
चेस्ट जर्नल का रिसर्च “भारत में सेप्सिस का बोझ” (https://journal.chestnet.org/article/S0012-3692(22)00254-9/fulltext) यह भी बताता है कि अस्पताल में मिलने वाला संक्रमण ज्यादा खतरनाक होता है. हालांकि यह संक्रमण अस्पताल से बाहर भी फ़ैल सकता है. लेकिन अस्तपाल में होने वाला संक्रमण ज्यादा खतरनाक होता है. बाहर के कीटाणु आम एंटीबायोटिक्स (जैसे एमोक्सि-सिलिन या सिप्रोफ्लोक्सासिन) से ठीक हो सकते हैं.
जबकि अस्पतालों में मौजूद बैक्टीरिया को ज्यादा ताकतवर दवाओं की जरूरत पड़ती है. कुछ बैक्टीरिया किसी भी दवा से ठीक नहीं होते और इन्हें "सुपरबग्स" कहा जाता है. इसलिए संक्रमण रोकने के लिए अस्पतालों में साफ़-सफाई, अच्छे इलाज और जागरूकता की ज़रूरत है.
भारत के लिए क्यों जरूरी है अपना डेटा?
भारत में सेप्सिस से जुड़ा डेटा, अब तक बहुत कम है. अभी तक पश्चिमी देशों के आंकड़ों के आधार पर ही भारत में सेप्सिस को समझने की कोशिश की जा रही थी.
जो भारत की स्थिति से मेल नहीं खाती. इसलिए अपना डेटा तैयार करना जरूरी है, ताकि सही नीतियां बनाई जा सकें और मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके.
हालांकि सरकार और ICMR (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) और सेप्सिस फोरम ऑफ इंडिया जैसे संस्थान इस दिशा में काम कर रहे हैं.
भारत में सेप्सिस से जुड़े डेटा को इकट्ठा करने और इसके असर को बेहतर तरीके से समझने के लिए "सेप्सिस रजिस्ट्री" बनाई जा रही है.
जिसमें 19 सरकारी और प्राइवेट अस्पताल शामिल है. इस सेप्सिस रजिस्ट्री डेटा से यह समझने में मदद मिलेगी कि सेप्सिस किन बैक्टीरिया से होता है. कौन-कौन से मरीज ज्यादा खतरे में हैं और किन दवाओं से इसका इलाज हो सकता है. इससे यह भी पता चलेगा कि शहरों और गांवों में सेप्सिस का कितना फर्क है. इसी के साथ ही निजी और सरकारी अस्पतालों में इसके इलाज में क्या अंतर है.