2025 में दंगे घटे लेकिन धार्मिक हिंसा और भेदभाव बढ़े
2025 में दंगे घटे लेकिन धार्मिक हिंसा और भेदभाव बढ़े हैं
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में साल 2025 में साम्प्रदायिक दंगे कम हुये हैं लेकिन नफरत तथा भेदभाव बढ़ गये हैं. नागरिक समाज संगठन सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज़्म (CSSS) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत में साम्प्रदायिक दंगों की संख्या भले ही पिछले साल की तुलना में कम हुई हो, लेकिन धर्म के आधार पर होने वाली हिंसा, भेदभाव और नफरत कहीं अधिक गहरी और संगठित होती जा रही है.
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में देशभर में कुल 28 साम्प्रदायिक दंगे दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या 59 थी. यानी एक साल में दंगों की घटनाओं में करीब 52 प्रतिशत की कमी आई है. इन दंगों में 4 लोगों की मौत हुई और कम से कम 360 लोग घायल हुए.
हालांकि CSSS का कहना है कि दंगों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं है कि साम्प्रदायिक हिंसा खत्म हो रही है. रिपोर्ट बताती है कि मॉब लिंचिंग और भीड़ द्वारा हिंसा अब भी जारी है.
2025 में ऐसी 14 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 8 लोगों की जान गई. पिछले साल 13 घटनाओं में 11 लोगों की मौत हुई थी. संगठन का मानना है कि खुली सड़क हिंसा कुछ कम जरूर हुई है, लेकिन पहचान के आधार पर हिंसा अब समाज के भीतर नए रूपों में मौजूद है.
CSSS की रिपोर्ट में कहा गया है कि साम्प्रदायिकता अब केवल दंगों तक सीमित नहीं रही. मुस्लिम और ईसाई समुदायों के खिलाफ संस्थागत भेदभाव, सार्वजनिक स्थानों से उनकी सांस्कृतिक मौजूदगी का धीरे-धीरे खत्म होना, नफरत भरे भाषणों में बढ़ोतरी और कट्टर हिंदुत्ववादी समूहों को मिलती कथित दंडमुक्ति गंभीर चिंता का विषय है.
इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में हिंदू धार्मिक प्रतीकों, त्योहारों और जुलूसों की आक्रामक मौजूदगी से बहुसंख्यक सांस्कृतिक वर्चस्व और मजबूत हुआ है.
राज्यवार आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 7 दंगे हुए. इसके बाद पश्चिम बंगाल और गुजरात में 4-4, मध्य प्रदेश में 3, और उत्तर प्रदेश, झारखंड, असम व उत्तराखंड में 2-2 दंगे दर्ज किए गए. बिहार और ओडिशा में 1-1 घटना सामने आई.
कुल दंगों में से करीब 40 प्रतिशत महाराष्ट्र और गुजरात में हुए. पूर्वी भारत में 37 प्रतिशत और उत्तर भारत में 25 प्रतिशत घटनाएं दर्ज की गईं. रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत में किसी भी साम्प्रदायिक दंगे की खबर नहीं है.
रिपोर्ट बताती है कि 28 दंगों में से नौ घटनाएं धार्मिक जुलूसों और त्योहारों के दौरान हुईं. पश्चिम बंगाल और झारखंड में राम नवमी, मध्य प्रदेश में हनुमान जयंती, असम में ईद, और गुजरात में गरबा कार्यक्रमों के दौरान तनाव और हिंसा देखी गई. इसके अलावा वक्फ संशोधन कानून के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान भी कई जगह हिंसा भड़की. पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ऐसी ही एक घटना में एक हिंदू पिता और बेटे की मौत हो गई.
CSSS ने अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकारों और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. संगठन का आरोप है कि जहां हिंसा में हिंदू समुदाय के लोग पीड़ित होते हैं, वहां प्रशासन और न्याय प्रक्रिया तेजी से काम करती है, लेकिन जब मुस्लिम पीड़ित होते हैं, तो वही तत्परता नजर नहीं आती. खास तौर पर बीजेपी-शासित राज्यों में प्रशासन पर आरोप है कि वह अक्सर हिंदू दंगाइयों के प्रति नरम और मुसलमानों के प्रति सख्त रुख अपनाता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दंगों के बाद प्रशासनिक बयान और मीडिया के एक हिस्से में मुसलमानों को बार-बार ‘मास्टरमाइंड’ या ‘किंगपिन’ बताने की प्रवृत्ति दिखती है. इसके कारण मुसलमानों की ज्यादा गिरफ्तारियां, कड़ी पूछताछ और दमनकारी पुलिस कार्रवाई होती है.
2025 में ईसाई समुदाय पर हमले भी रिपोर्ट में विशेष चिंता का विषय बताए गए हैं. खासकर क्रिसमस के आसपास देश के कई हिस्सों में हमले पहले से ज्यादा संगठित और आक्रामक रहे.
यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, नवंबर 2025 तक देशभर में ईसाइयों के खिलाफ 706 हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकतर को धर्मांतरण विरोधी अभियानों से जोड़ा गया है. छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में ईसाइयों को दफनाने के अधिकार से वंचित करना गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताया गया है.
रिपोर्ट के अंत में CSSS ने कहा है कि निष्पक्ष कानून लागू किए बिना, प्रशासन की जवाबदेही तय किए बिना और संस्थागत सुधार किए बिना अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और देश में कानून का राज सुनिश्चित करना संभव नहीं है. (Symbolic Photo)