टूट रहा है इजराइल की अजेय शक्ति होने का भ्रम
नई दिल्ली । डेस्क: हाल के दिनों में इजराइली मीडिया में एक नया और चौंकाने वाला स्वर उभर रहा है, जो इजराइल के 'अजेय' होने के दशकों पुराने दावे पर सवालिया निशान लगा रहा है. जहां एक ओर युद्ध में निरंतर सफलताओं के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर 'हार के आख्यान' की पहली झलक भी दिखाई देने लगी है. इजराइली समाचार पत्र 'येदिओथ अहरोनोथ' की रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया के बीच ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने की योजनाओं की विफलता को लेकर भारी तनाव है.
यह संकट तब और गहरा गया जब इजराइली सेना प्रमुख इयाल ज़मीर ने सुरक्षा कैबिनेट को चेतावनी दी कि जनशक्ति की कमी के कारण सेना 'स्वयं में ढह' सकती है.
जब युद्ध के बीच राजनीतिक और सुरक्षा गलियारों में एक-दूसरे पर दोषारोपण शुरू हो जाए, तो यह किसी भी देश के लिए शुभ संकेत नहीं होता.
एक महीने पहले अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर संयुक्त हमला शुरू करते समय इजराइल ने निश्चित रूप से इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी. युद्ध की शुरुआत में इजराइल में उत्साह और 'ऐतिहासिक' समन्वय का माहौल था, जहां नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच दर्जनों बार बातचीत हुई थी.
दोनों सेनाओं ने मिलकर भारी बमबारी की, शीर्ष नेताओं की हत्याएं कीं और ईरान के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया, लेकिन ईरान की प्रतिक्रिया ने इजराइल की उम्मीदों को धराशायी कर दिया है.
ईरान ने इजराइली ठिकानों पर दैनिक हमलों के साथ जवाब दिया है. कड़े सेंसरशिप के कारण नुकसान की सटीक सीमा जानना कठिन है, लेकिन डिमोना परमाणु रिएक्टर, हाइफा तेल रिफाइनरी और बेन गुरियन हवाई अड्डे जैसे रणनीतिक लक्ष्य प्रभावित हुए हैं. इजराइली नागरिक हफ्तों से बम आश्रयों में दुबके हैं और ईरान की पलटवार करने की क्षमता उम्मीदों से कहीं अधिक साबित हुई है.
इस बीच, लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ एक नया मोर्चा खुल गया है, जिसे इजराइल ने पहले ही कमजोर मान लिया था. उत्तरी इजराइल में हिजबुल्लाह के मिसाइल हमलों और जमीनी प्रतिरोध ने इजराइली सेना में हताशा पैदा कर दी है.
इजराइल की विनाश करने की क्षमता पर कोई संदेह नहीं है लाखों लेबनानी विस्थापित हुए हैं और बुनियादी ढांचा तबाह हो गया है, लेकिन इस सैन्य अभियान का कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आता. यही स्थिति गाजा में भी देखी गई, जहां भारी तबाही के बाद भी हमास अस्तित्व में है और इजराइल अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नरसंहार के आरोपों का सामना कर रहा है.
इन सभी संघर्षों में एक समान बात यह है कि इजराइल का दृष्टिकोण पूरी तरह सैन्य है, जिसमें किसी भी यथार्थवादी राजनीतिक योजना का अभाव है. इजराइल की यह सैन्य निर्भरता अब एक खतरनाक मोड़ ले रही है. नेतन्याहू की 'पूर्ण विजय' की बात को उस दण्डमुक्ति (impunity) के संदर्भ में समझा जा सकता है, जिसे इजराइल ने वर्षों से अनुभव किया है.
इजराइली समाज और सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष पदों पर अब कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों का दबदबा बढ़ रहा है, जो तकनीकी श्रेष्ठता पर आधारित छोटे युद्धों के बजाय 'क्षेत्र पर स्थायी कब्जे' और 'दुश्मन के बुनियादी ढांचे व लोगों' के विनाश वाली लंबी जंग की वकालत कर रहे हैं. 'ग्रेटर इजराइल' का प्रोजेक्ट अब एक अनकहा राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत बन गया है, जो क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.
इजराइल इस युद्ध को समाप्त करने में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है, क्योंकि वह अमेरिका को जमीनी अभियानों की ओर धकेलने और बातचीत को विफल करने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि, अमेरिकी प्रशासन की रणनीति और क्षमताओं पर भी अब सवाल उठने लगे हैं. इजराइल के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि अमेरिका किसी भी समय अपनी सीमाओं में वापस लौट सकता है, जिससे इजराइल के पास कोई बेहतर विकल्प नहीं बचेगा.
जिस तरह 1956 का स्वेज संकट ब्रिटेन और फ्रांस के लिए साम्राज्य के अंत का क्षण था, उसी तरह ईरान के साथ इस युद्ध में अमेरिका को खींचना इजराइल के लिए एक ऐतिहासिक पतन की शुरुआत साबित हो सकता है.
इजराइल की अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता और अमेरिकी जनता के बीच इजराइल के प्रति घटता समर्थन एक ऐसा 'विषाक्त मिश्रण' तैयार कर रहा है, जो अंततः इजराइल को एक नाटकीय पतन की ओर ले जा सकता है.