IIT शोध: 1980 से सिंधु का जल प्रवाह 8% बढ़ा, जबकि गंगा में 17% की भारी गिरावट
नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय उपमहाद्वीप की दो सबसे विशाल नदी प्रणालियों सिंधु और गंगा के जल स्तर को लेकर एक चौंकाने वाला शोध सामने आया है. 'अर्थ्स फ्यूचर' (AGU) जर्नल में प्रकाशित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गांधीनगर के शोधकर्ताओं के इस अध्ययन के अनुसार, पिछले चार दशकों में ये दोनों नदियाँ विपरीत जल-वैज्ञानिक दिशाओं में आगे बढ़ रही हैं.
अध्ययन के आंकड़ों से पता चलता है कि जहाँ 1980 से 2021 के बीच सिंधु बेसिन के वार्षिक जल प्रवाह में लगभग 8% की वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं इसके विपरीत गंगा बेसिन में इसी अवधि के दौरान 17% की भारी गिरावट देखी गई है. वैज्ञानिकों ने उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले भौतिकी-आधारित हाइड्रोलॉजिकल मॉडल 'ParFlow-CLM' का उपयोग करके 42 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें वर्षा, भूजल, नदी प्रवाह और सिंचाई पंपिंग के बीच के जटिल संबंधों को जोड़ा गया.
सिंधु नदी तंत्र में जल प्रवाह बढ़ने का मुख्य कारण पश्चिमी विक्षोभ और मानसून में परिवर्तन के चलते बढ़ी हुई वर्षा को माना जा रहा है. अध्ययन के अनुसार, मुख्य सिंधु नदी और उसकी पश्चिमी सहायक नदियों झेलम और चेनाब में जल प्रवाह में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई है.
हालांकि, यह वृद्धि पूरे बेसिन में एक समान नहीं है. भारत के हिस्से वाली दो पूर्वी सहायक नदियाँ, रावी और सतलुज, बेसिन-व्यापी वृद्धि के बावजूद जल प्रवाह में महत्वपूर्ण कमी का सामना कर रही हैं.
इसके उलट, गंगा बेसिन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है जहाँ वर्षा में लगभग 10% की कमी आई है और तापमान में वृद्धि के कारण वायुमंडलीय जल की मांग बढ़ गई है. लेकिन शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि गंगा के सूखने का सबसे बड़ा कारण सिंचाई के लिए किया जाने वाला अत्यधिक भूजल दोहन है.
यमुना और ऊपरी गंगा के कुछ हिस्सों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि नदियों और एक्विफर्स (Aquifers) के बीच प्रवाह की प्राकृतिक दिशा ही उलट गई है, जिससे नदियाँ अब भूजल प्रणालियों को भरने के चक्कर में अपना पानी खो रही हैं.
यह अध्ययन सिंधु जल संधि के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है. विशेष रूप से अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा संधि के निलंबन और पश्चिमी नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं में तेजी लाने के संदर्भ में यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण है.
आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और पानी के मानवीय उपयोग के बदलते स्वरूप ने अब जल-साझाकरण व्यवस्थाओं पर 'पुनर्विचार' करना अनिवार्य बना दिया है.
पाकिस्तान में कृषि मुख्य रूप से सिंधु की मुख्य धारा पर निर्भर है जहाँ वर्षा बढ़ने से स्थिति उतनी विकट नहीं है, लेकिन भारतीय पंजाब जैसे क्षेत्रों में घटता भूजल बड़ा संकट पैदा कर रहा है.
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूजल के अंधाधुंध दोहन को नहीं रोका गया और फसल विविधीकरण जैसी अनुकूल सिंचाई पद्धतियों को नहीं अपनाया गया, तो गंगा बेसिन में नदियों के सूखने का सिलसिला आने वाले समय में और भी तीव्र हो सकता है.