25 हजार साल पहले इंसान कैसे करता था नशा?
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: शाम ढलते ही शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करना आज की मानव सभ्यता के लिए कोई नई बात नहीं है. लेकिन इंसान ने नशा करना कब शुरू किया था? क्या हजारों साल पहले भी इसका चलन था? इस सवाल ने हमेशा से वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों को आकर्षित किया है. हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं की एक टीम ने नशे के इतिहास को खंगालते हुए एक चौंकाने वाला खुलासा किया है. शोध में पता चला है कि इंसान आज से करीब 25 हजार साल पहले भी नशा करता था, और इसके लिए वह किसी आधुनिक शराब या रसायन का नहीं, बल्कि एक खास प्राकृतिक चीज का इस्तेमाल करता था.
सुपारी से जुड़ा 25 हजार साल पुराना नशा
अब तक वैज्ञानिकों का मानना था कि इंसान ने नवपाषाण काल (Neolithic Era) में खेती शुरू करने के बाद नशा करना सीखा था. इज़राइल में मिले 13 हजार साल पुराने पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर माना जाता था कि जौ से बनी बीयर या फर्मेंटेड ड्रिंक ही इंसान का सबसे पहला नशा था. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी के 'ऑस्ट्रेलियन रिसर्च सेंटर फॉर ह्यूमन इवोल्यूशन' के शोधकर्ताओं ने इस धारणा को बदल दिया है.
प्रोफेसर कार्नी मैथेसन और मिशेल लैंगली के नेतृत्व में हुआ यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका 'साइंस एडवांसेज' में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन के अनुसार, 13 हजार नहीं बल्कि 25 हजार साल पहले भी इंसान नशा करता था और उस समय नशे का मुख्य जरिया सुपारी थी.
प्राचीन कंकालों के दांतों ने उगला सच
वैज्ञानिकों ने इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप से मिले दो प्राचीन शिकारियों के कंकालों के दांतों का गहन अध्ययन किया. इनमें से एक कंकाल लगभग 25 हजार से 16 हजार साल पुराना है, जबकि दूसरा 7600 से 6300 साल पुराना है. जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने दोनों कंकालों के दांतों पर एक असामान्य और गहरा गोलाकार गड्ढा (खॉंज) देखा.
इंसानी अवशेषों में इस तरह का बायो-आर्कियोलॉजिकल निशान पहली बार पाया गया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह निशान मुंह में लंबे समय तक साबुत सुपारी रखकर चूसने के कारण बना था. उस दौर में अभी खेती की शुरुआत भी नहीं हुई थी और लोग शिकार पर ही निर्भर थे.
नशे का वैज्ञानिक विश्लेषण
आमतौर पर पान और चूने के साथ सुपारी चबाने से उसका नशीला असर सक्रिय होता है. लेकिन क्या केवल साबुत सुपारी चूसने से भी नशा हो सकता है? इसे साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में सुपारी को कृत्रिम लार में भिगोकर परीक्षण किया. प्रयोग में पाया गया कि साबुत सुपारी चूसने से भी 'अरेकोलीन' (Arecoline) नामक न्यूरोएक्टिव अल्कलॉइड पर्याप्त मात्रा में निकलता है, जो इंसानी शरीर और तंत्रिका तंत्र पर सीधा प्रभाव डालता है.
इसके अलावा, प्रोफेसर कार्नी मैथेसन ने बायो-केमिकल टेस्ट के जरिए उन प्राचीन दांतों के ऊतकों में भी अरेकोलीन की मौजूदगी दर्ज की, जिससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि वे लोग सुपारी चूसकर नशा करते थे.
दवा की चाहत और दांतों की बीमारी
विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय सुपारी चूसने से मिलने वाला अहसास आज के पान चबाने जैसा तो नहीं था, लेकिन इसका असर दिमाग को प्रभावित करता था. कुछ शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि शुरुआती दौर में लोगों ने दांतों के दर्द से राहत पाने के लिए एक दवा के रूप में सुपारी चूसना शुरू किया होगा.
हालांकि, अस्थायी आराम देने वाली इस आदत ने लंबे समय में उनके स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाया. सुपारी चूसने की वजह से उनके दांतों में गंभीर बीमारी हो गई, दांत कमजोर पड़ गए और उनका क्षरण इतना बढ़ गया कि उनके लिए भोजन चबाना भी मुश्किल हो गया था. इंडोनेशिया में मिले दोनों कंकालों के दांतों में इस बीमारी और क्षरण के स्पष्ट लक्षण मिले हैं.