तमिलनाडु और प. बंगाल में सर्वाधिक वनों की कटाई: IIT अध्ययन
नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के एक नये अध्ययन ने खुलासा किया है कि 2015 से 2019 के बीच भारत ने प्रत्येक 1 वर्ग किलोमीटर नये वन क्षेत्र की तुलना में 18 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र खो दिया. यह अध्ययन प्रोफेसर राज रामसंकलन के नेतृत्व में किया गया, जिसमें सास्त्रा डीम्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. वासु सत्यकुमार और श्रीधरन गोवथम ने सहयोग किया. इस शोध में कोपर्निकस ग्लोबल लैंड सर्विस (CGLS) लैंड कवर मैप का उपयोग करके इस पांच साल की अवधि में वन क्षेत्र में हुए परिवर्तनों का आकलन किया गया.
अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में भारत के सभी राज्यों में वन क्षेत्र में शुद्ध हानि दर्ज की गई. जहां 56.3 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र जोड़ा गया, वहीं 1,032.89 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का नुकसान हुआ. इस नुकसान का लगभग आधा हिस्सा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हुआ. अध्ययन में यह भी पाया गया कि नये जोड़े गए वन क्षेत्र की गुणवत्ता चिंताजनक है. अधिकांश नये वन क्षेत्र टापू जैसे या खंडित हैं, जिनमें "संरचनात्मक कनेक्टिविटी" का अभाव है, जो जैव विविधता को बनाये रखने के लिये आवश्यक निरंतर हरे क्षेत्र को दर्शाता है.
डॉ. सत्यकुमार ने कहा, "हमारे परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि 2015 से 2019 के बीच जोड़े गये अधिकांश नये वन टापू जैसे, अत्यधिक खंडित और पारिस्थितिक रूप से कमजोर हैं. वर्तमान मात्रा-आधारित वनीकरण दृष्टिकोण से आगे बढ़कर वन नियोजन में संरचनात्मक कनेक्टिविटी को स्पष्ट रूप से शामिल करने की आवश्यकता है."
कनेक्टिविटी का महत्व
संरचनात्मक कनेक्टिविटी पारिस्थितिक तंत्र की लचीलापन और पुनर्जनन के लिए महत्वपूर्ण है. बड़े, निरंतर वन क्षेत्र विविध वन्यजीवों का समर्थन करते हैं, पारिस्थितिक संतुलन बनाये रखते हैं और प्राकृतिक व मानव-निर्मित दोनों तरह की गड़बड़ियों के प्रति अधिक लचीले होते हैं. दूसरी ओर, खंडित वन जानवरों की आवाजाही और अस्तित्व को बाधित करते हैं. अध्ययन में कहा गया है कि बाघ जैसे प्रजातियां, जिन्हें शिकार और प्रजनन के लिये बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है, खंडित वनों में जीवित रहने के लिये संघर्ष करती हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है.
राज्यों का प्रदर्शन
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और राजस्थान ने मिलकर इस अवधि में जोड़े गये कुल 56.3 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा योगदान दिया. हालांकि, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हुये भारी नुकसान ने इस लाभ को काफी हद तक बेअसर कर दिया. इन दोनों राज्यों में कुल वन हानि का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा रहा.
नया ढांचा और तकनीक
शोध दल ने रिमोट सेंसिंग डेटा और ओपन-सोर्स टूल्स का उपयोग करके देश भर में वन कनेक्टिविटी को मैप करने और निगरानी करने के लिये एक नया ढांचा प्रस्तावित किया है, जो राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर लागू हो सकता है. यह ढांचा वनों की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने और उनके संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में मदद कर सकता है.
भारतीय वन सर्वेक्षण से तुलना
यह अध्ययन भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्टों से अलग निष्कर्ष प्रस्तुत करता है, जो हाल के वर्षों में वन क्षेत्र में समग्र वृद्धि की बात करता है. इस अंतर का कारण भारतीय वन सर्वेक्षण और कोपर्निकस ग्लोबल लैंड सर्विस द्वारा उपयोग किये गये अलग-अलग परिभाषाएं और डेटासेट हैं. भारतीय वन सर्वेक्षण वनों को कम से कम 10 प्रतिशत पेड़ों की छतरी वाले क्षेत्र के रूप में परिभाषित करता है और 23.5 मीटर रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट इमेजरी का उपयोग करता है. वहीं, कोपर्निकस ग्लोबल लैंड सर्विस डेटासेट 15 प्रतिशत छतरी थ्रेशोल्ड और 100 मीटर रिजॉल्यूशन का उपयोग करता है.
डॉ. सत्यकुमार ने कहा, "चूंकि भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट में वन कनेक्टिविटी का आकलन शामिल नहीं है, इसलिए सीधे तुलना संभव नहीं है. हालांकि, हमारे डेटा स्रोत की वैश्विक स्तर पर 85 प्रतिशत से अधिक सटीकता सत्यापित है, जिससे हमारे कनेक्टिविटी परिणाम विश्वसनीय हैं. यदि भारतीय वन सर्वेक्षण का डेटा GIS-संगत प्रारूप में उपलब्ध हो, तो हमारी पद्धति को आसानी से उस पर लागू किया जा सकता है."
पारिस्थितिक संकट
यह अध्ययन भारत की बढ़ती पारिस्थितिक संकट की ओर इशारा करता है. 2024 नेचर कंजर्वेशन इंडेक्स के अनुसार, भारत 180 देशों में 176वें स्थान पर रहा, जिसका स्कोर 45.5 था, और यह जैव विविधता संरक्षण के लिये सबसे खराब पांच देशों में शामिल था. केवल किरिबाती, तुर्की, इराक और माइक्रोनेशिया इससे भी बदतर स्थिति में थे.
नेचर कंजर्वेशन इंडेक्स ने 25 संकेतकों का उपयोग करके देशों का मूल्यांकन किया, जिसमें भूमि प्रबंधन, जैव विविधता के लिए खतरे, शासन क्षमता और भविष्य के रुझान शामिल थे. भारत की निम्न रैंकिंग गंभीर आवास हानि, बढ़ते प्रदूषण और वन्यजीव आबादी में कमी को दर्शाती है. रिपोर्ट में अपर्याप्त संरक्षण कानून को भी एक प्रमुख कारक बताया गया.
जैव विविधता का महत्व
नेचर कंजर्वेशन इंडेक्स के उद्धरण के अनुसार, "भारत विश्व के मेगा-विविध देशों में से एक है, जिसमें विश्व की लगभग 7-8 प्रतिशत प्रलेखित प्रजातियां केवल 2.4 प्रतिशत कुल भूमि क्षेत्र में फैली हुई हैं." यह अध्ययन और नेचर कंजर्वेशन इंडेक्स रिपोर्ट मिलकर एक स्पष्ट संदेश देते हैं कि भारत के वन भले ही कागजों पर बढ़ रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत में जैव विविधता को गंभीर खतरा है.
IIT बॉम्बे का यह अध्ययन और नेचर कंजर्वेशन इंडेक्स की रैंकिंग भारत के सामने खड़े पर्यावरणीय संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं. वनों की कटाई और खंडित वन क्षेत्रों की समस्या को हल करने के लिए नीतियों में सुधार, बेहतर निगरानी और संरचनात्मक कनेक्टिविटी पर ध्यान देना आवश्यक है. यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो भारत की समृद्ध जैव विविधता को अपूरणीय क्षति हो सकती है.