कार्बन उत्सर्जन शून्य होने पर भी हीटवेव्स कम नहीं होंगी
नई दिल्ली । डेस्क: जलवायु परिवर्तन के दौर में एक नई चिंताजनक खोज ने दुनिया को हिला दिया है. मेलबर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का एक ताज़ा अध्ययन दावा करता है कि भले ही 2050 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को शून्य पर ला दिया जाए, फिर भी हीटवेव्स अगले हज़ार साल तक जारी रहेंगी.
पर्यावरण अनुसंधान पत्रिका 'क्लाइमेट' में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, समय के साथ ये लहरें और भी तीव्र, लंबी और घातक होती जाएंगी, खासकर भूमध्यरेखीय देशों में.
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता एंड्र्यू किंग ने कहा, "कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य महत्वपूर्ण है, लेकिन यह जादू की छड़ी नहीं है. कुछ क्षेत्रों में हीटवेव्स की संख्या और तीव्रता बढ़ती ही रहेगी." वैज्ञानिकों ने 2030 से 2060 के बीच उत्सर्जन शून्य होने की संभावना को आधार बनाकर मॉडल तैयार किया. उनके विश्लेषण से पता चला कि दक्षिणी महासागर के गर्म होने से प्रभावित देशों में हीटवेव्स की समस्या और गंभीर हो सकती है. यदि उत्सर्जन शून्य होने में देरी हुई, तो स्थिति और बिगड़ जाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि औद्योगिक क्रांति से पहले की जलवायु व्यवस्था में वापस लौटना असंभव होगा. शून्य उत्सर्जन के 100 साल बाद भी हीटवेव्स की संख्या बढ़ सकती है. ऑस्ट्रेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सारा पर्किन्स ने स्पष्ट किया, "कई लोग सोचते हैं कि उत्सर्जन बंद होते ही ग्लोबल वार्मिंग रुक जाएगी, लेकिन यह गलतफहमी है. हीटवेव्स बनी रहेंगी, हालांकि तेज़ी से लक्ष्य हासिल करने से उनकी तीव्रता धीरे-धीरे कम हो सकती है." उन्होंने जोर दिया कि उत्सर्जन कम करने का प्रयास अब भी प्राथमिकता होनी चाहिए, वरना हीटवेव्स के प्रभाव और विनाशकारी होंगे.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, हीटवेव तब घोषित की जाती है जब किसी जगह का अधिकतम तापमान सामान्य से 5 डिग्री अधिक हो और दिन का अधिकतम तापमान 40 डिग्री को पार कर जाए. इस साल यूरोप में हीटवेव्स ने भयानक रूप लिया था, जहां फ्रांस और इटली जैसे देशों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर चढ़ गया. परिणामस्वरूप, पूरे महाद्वीप में करीब 10 लोगों की मौत हो गई. जलवायु परिवर्तन ही इन लहरों का मुख्य कारण है, जो छोटे-छोटे तापमान वृद्धि को भी घातक बना देता है.
मौसम विभाग के आंकड़ों से साफ है कि 1960 में जहां विभिन्न देशों में तापमान 40 डिग्री पार करने की घटनाएं सीमित थीं, वहीं 2025 तक ये 20 गुना बढ़ चुकी हैं. ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का मानना है कि शून्य उत्सर्जन से स्थिति में तुरंत बदलाव नहीं आएगा, लेकिन इसे जल्द हासिल करना हीटवेव्स की तीव्रता को नियंत्रित करने का एकमात्र रास्ता है. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भूमध्यरेखा के निकटवर्ती देशों में हर साल हीटवेव्स पुराने रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं, जिससे स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा.
यह अध्ययन जलवायु संकट से निपटने की वैश्विक रणनीति पर पुनर्विचार की मांग करता है. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ हीटवेव्स से बचाव के उपायों पर भी ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य की पीढ़ियां इस संकट का शिकार न बनें.