दिल्ली जिमखाना क्लब का विवाद हाई कोर्ट में 6 जुलाई को सुनवाई
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली के प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली कराने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ क्लब के सदस्यों और कर्मचारी संघ ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस पर रोक लगाने की मांग को लेकर दायर इन याचिकाओं पर 6 जुलाई को न्यायमूर्ति अवनीश झींगन की अदालत में सुनवाई होगी.
यह पूरा मामला लुटियंस दिल्ली के सफदरजंग रोड पर स्थित 27.3 एकड़ में फैले इस औपनिवेशिक काल के क्लब की जमीन को वापस लेने से जुड़ा है.
दरअसल, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले L&DO ने 22 मई को एक आदेश जारी कर "रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत और सुरक्षित करने" का हवाला देते हुए क्लब को 5 जून तक जमीन सौंपने को कहा था.
इसके बाद, 29 जून को संपदा अधिकारी बिपिन कुमार सिंह ने सार्वजनिक परिसर (अनाधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत एक कारण बताओ नोटिस जारी किया. इस नोटिस में क्लब और वहां मौजूद लोगों से 7 जुलाई तक जवाब मांगा गया है और उसी दिन दोपहर 2:30 बजे व्यक्तिगत सुनवाई के लिए पेश होने का निर्देश दिया गया है.
सरकार के इस कदम के खिलाफ क्लब के सदस्य विजय खुराना और 'दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड स्टाफ वेलफेयर एसोसिएशन' ने अदालत में याचिकाएं दायर की हैं.
विजय खुराना की इस कानूनी लड़ाई को क्लब के 500 से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा रक्षा और सुरक्षा के नाम पर दिए गए कारण कानूनन सही नहीं हैं और यह पूरी प्रक्रिया तय कानूनी रास्ते को दरकिनार कर जबरन बेदखल करने की एक कोशिश है.
गौरतलब है कि इससे पहले 26 मई को केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह 5 जून तक क्लब के परिसर का जबरन कब्जा नहीं लेगी. अब इस मामले में 6 जुलाई को होने वाली अदालती सुनवाई बेहद अहम होगी, जहां यह तय होगा कि क्लब को बेदखली के इस नोटिस से अंतरिम राहत मिलती है या नहीं.
दिल्ली जिमखाना क्लब का विवाद लुटियंस दिल्ली की बेशकीमती जमीन के मालिकाना हक, क्लब के प्रबंधन में अनियमितताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ा है. इस पूरे विवाद को समझने के लिए इसके तीन मुख्य पहलुओं को देखना जरूरी है:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जमीन का मामला
इस क्लब की स्थापना ब्रिटिश काल के दौरान साल 1913 में 'इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब' के रूप में हुई थी. साल 1928 में इसे सफदरजंग रोड पर स्थित 27.3 एकड़ की बेहद कीमती सरकारी जमीन पर एक 'परपेचुअल लीज' (स्थायी पट्टे) के तहत स्थानांतरित किया गया. देश की आजादी के बाद इसके नाम से 'इंपीरियल' शब्द हटा दिया गया. दशकों तक यह क्लब देश के शीर्ष राजनेताओं, नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों और संभ्रांत वर्ग के लिए एक बेहद विशिष्ट और वीआईपी सोशल क्लब बना रहा, जहां सदस्यता के लिए 30 से 35 साल तक की लंबी वेटिंग लिस्ट हुआ करती थी.
प्रबंधन का विवाद और सरकारी नियंत्रण (2020-2022)
विवाद की शुरुआत साल 2020 में हुई जब कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने क्लब के कामकाज में वित्तीय अनियमितताओं, नियमों के उल्लंघन और विशेष रूप से सदस्यता आवंटन में भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लगाए. सरकार का तर्क था कि यह क्लब 'पब्लिक इंटरेस्ट' के खिलाफ काम कर रहा है और कुछ खास परिवारों की जागीर बन गया है. मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) पहुंचा. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, साल 2022 में ट्रिब्यूनल ने सरकार को क्लब के निर्वाचित प्रबंधन को हटाने की अनुमति दे दी. इसके बाद सरकार द्वारा नियुक्त एक 15 सदस्यीय समिति ने क्लब के प्रशासन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.
ताजा विवाद: बेदखली और सुरक्षा का हवाला (2026)
यह विवाद साल 2026 में तब और गहरा गया जब केंद्र सरकार ने क्लब को पूरी तरह खाली कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी. भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने 22 मई 2026 को क्लब के दशकों पुराने पट्टे (Lease Deed) को रद्द करते हुए 5 जून 2026 तक जमीन वापस सौंपने का आदेश दिया. सरकार का कहना है कि यह जमीन प्रधानमंत्री आवास के बेहद करीब एक रणनीतिक और संवेदनशील इलाके में है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और "रक्षा बुनियादी ढांचे (Defence Infrastructure) को मजबूत व सुरक्षित करने" के लिए इसका खाली होना बेहद जरूरी है.
इसके बाद सरकार ने क्लब को 'सार्वजनिक परिसर अधिनियम, 1971' के तहत अवैध कब्जाधारी मानते हुए बेदखली का कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया है. दूसरी तरफ, क्लब के सदस्य और कर्मचारी संघ इस कदम का कड़ा विरोध कर रहे हैं. उनका आरोप है कि सरकार बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के जबरन बेदखली की कोशिश कर रही है और सुरक्षा का दिया गया हवाला महज एक बहाना है. यह मामला वर्तमान में दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन है, जहां दोनों पक्षों के बीच कानूनी लड़ाई चल रही है.