प्री-सेंसरशिप को अमोल पालेकर की चुनौती
प्री-सेंसरशिप को अमोल पालेकर की चुनौती पर HC दिसंबर में करेगा सुनवाई
मुंबई । डेस्क: नाटकों और ड्रामा की स्क्रिप्ट पर प्री-सेंसरशिप को अनिवार्य बनाने वाले नियमों को कलात्मक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताते हुए, अभिनेता अमोल पालेकर की याचिका पर बॉम्बे हाई कोर्ट दिसंबर में सुनवाई करेगा. पालेकर ने अपनी याचिका में कहा है कि यह प्री-सेंसरशिप कई ऐतिहासिक नाटकों को उनके मूल रूप में मंचित होने से रोकती है.
एक दशक से अधिक के इंतजार के बाद, हाई कोर्ट ने गुरुवार 6 नवंबर, 2025 को कहा कि वह इस मामले को 5 दिसंबर को सुनेगा. न्यायमूर्ति रियाज़ छागला और न्यायमूर्ति फरहान दुबाश की खंडपीठ के सामने, पालेकर के वकील अनिल अंतुरकर ने जोर देकर कहा कि 2016 में दायर यह याचिका अब अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचनी चाहिए क्योंकि याचिकाकर्ता अब 85 वर्ष के हो चुके हैं.
वकील ने अदालत को बताया कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या बॉम्बे पुलिस अधिनियम के तहत पुलिस के पास नाटकों की प्री-सेंसरशिप का अधिकार है. उन्होंने यह भी कहा कि हम अब ऐसे दौर में हैं जहां ओटीटी (OTT) पर शो और सीरीज़ पर कोई सेंसरशिप नहीं है.
पालेकर ने अपनी याचिका में महाराष्ट्र राज्य प्रदर्शन जांच बोर्ड द्वारा नाटकों की स्क्रिप्ट के प्री-सेंसरशिप को अनिवार्य बनाने वाले नियमों को 'मनमाना' और संविधान में नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है.
इन नियमों के तहत, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के हित में प्रदर्शन के पूर्व निरीक्षण और स्क्रिप्ट की जांच अनिवार्य है, जिसके बाद सशर्त प्रमाण पत्र जारी किया जाता है.