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HC: 14 साल की दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की मिली अनुमति

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06 जुल. 2026, 03:57 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक मानवीय फैसला सुनाते हुए 14 वर्ष की एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह से अधिक के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की इजाजत दे दी है. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग पीड़िता को उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन गर्भ धारण करने के लिए मजबूर करना, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त उसके गरिमा, गोपनीयता और प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) के मौलिक अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन है.


न्यायालय ने यह आदेश पीड़िता के अभिभावक की ओर से दायर उस याचिका पर दिया, जिसमें कानूनी सीमा पार होने के बाद गर्भपात की अनुमति मांगी गई थी. इससे पहले कोर्ट ने 29 जून को एक मेडिकल बोर्ड का गठन कर पीड़िता के स्वास्थ्य की जांच करने के निर्देश दिए थे. 


1 जुलाई को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में मेडिकल बोर्ड ने बताया कि लड़की 28 हफ्ते और पांच दिन की गर्भवती है. बोर्ड ने आगाह किया था कि गर्भावस्था के इस उन्नत चरण में गर्भपात करने से संक्रमण, ब्लीडिंग और सर्वाइकल इंजरी जैसे जोखिम हो सकते हैं, लेकिन साथ ही यह भी चेतावनी दी कि यदि उसे इस गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर किया गया, तो इससे उसे गंभीर शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरना पड़ेगा. 


राज्य सरकार ने भी याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि गर्भपात की अनुमति न मिलने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी.


मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, नाबालिग लड़की का दिसंबर 2025 में अपहरण कर उसका यौन शोषण किया गया था. आरोपी द्वारा डराए-धमकाए जाने के कारण उसने डर के मारे अपने परिवार को कुछ नहीं बताया. 


जून 2026 में पेट में तेज दर्द के बाद जब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब अल्ट्रासाउंड जांच में उसके गर्भवती होने का खुलासा हुआ. इसके बाद परिजनों ने पुलिस से संपर्क किया, जहां भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई.


हाई कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि पीड़िता को एक सप्ताह के भीतर सरकारी या जिला अस्पताल में भर्ती कराया जाए. अदालत ने आदेश दिया है कि इस जटिल प्रक्रिया को कम से कम दो स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन की विशेषज्ञ मेडिकल टीम की देखरेख में अंजाम दिया जाए. इसके लिए पीड़िता की सहमति के साथ-साथ उसके पिता या अभिभावक की मंजूरी भी अनिवार्य होगी. 


इसके अलावा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने, एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान करने और गोपनीयता का ध्यान रखते हुए बेहतर प्री-ऑपरेटिव व पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल सुनिश्चित करने को कहा गया है. 


चल रही आपराधिक जांच में सहायता के लिए मेडिकल टीम को भ्रूण के टिशू और डीएनए नमूने सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं, और प्रक्रिया पूरी होने के बाद अस्पताल को हाई कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP