हसदेव अरण्य: 7 लाख पेड़ कटने से मचेगी भारी तबाही- कांग्रेस
नई दिल्ली । डेस्क: छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य वन्य क्षेत्र में कोयला खनन परियोजना को मिली हालिया मंजूरी के बाद देश की सियासत गरमा गई है. कांग्रेस ने रविवार को केंद्र की मोदी सरकार और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी की "ट्रबल-इंजन" सरकार आदिवासियों के 'जल-जंगल-जमीन' और पर्यावरण की कीमत पर इस परियोजना को हर हाल में पूरा करने पर आमादा है.
यह विवाद तब और बढ़ गया जब पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) ने सरगुजा जिले के 'केन्ते एक्सटेंशन ओपनकास्ट कोल ब्लॉक' में खनन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. बता दें कि इस कोल ब्लॉक का विकास अडानी समूह द्वारा किया जा रहा है. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया कि इस मंजूरी के कारण इलाके के घने साल जंगलों से लगभग 7 लाख पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होगी, जो पर्यावरण के लिए एक बड़ा संकट साबित होगी.
जैव विविधता और हाथियों के कॉरिडोर को खतरा
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर लिखा कि यह परियोजना क्षेत्र की जैविक विविधता के लिए एक गंभीर खतरा है, जिससे तेंदुए, सुस्त भालू (स्लोथ बियर) और भारत के राष्ट्रीय विरासत पशु यानी हाथियों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगेगा.
यह प्रस्तावित कोल ब्लॉक लेमरू एलीफेंट कॉरिडोर से महज 3.6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. वन सलाहकार समिति की बैठक के ब्यौरे में भी यह स्वीकार किया गया है कि खनन से हाथियों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है, जिससे इस क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने की पूरी आशंका है.
नदियों के जलप्रवाह पर पड़ेगा बुरा असर
विशेषज्ञों और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हसदेव-अरण्य के जंगल हसदेव नदी और बांगो बांध के जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) हैं. इन जंगलों के कटने से पूरे क्षेत्र की जल स्थिरता और नदियों के जलप्रवाह पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा.
जयराम रमेश ने पुराने घटनाक्रम का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि 26 जनवरी 2022 को तत्कालीन भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोई भी नया खनन पट्टा न देने की बात कही गई थी. उन्होंने सरकार द्वारा दी जाने वाली क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की दलील को पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे केवल एक धोखा करार दिया.
वैज्ञानिक अध्ययन भी जता चुके हैं चिंता
भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा हसदेव-अरण्य को लेकर किए गए जैव विविधता अध्ययन में भी यह बात सामने आ चुकी है कि इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों से मिट्टी का भारी क्षरण और भू-क्षरण (Gully Erosion) हो सकता है.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भी चेतावनी दी है कि इस परियोजना को लागू करने से क्षेत्र में ऐसा पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और सामाजिक नुकसान होगा जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी. गौरतलब है कि इस कोयला ब्लॉक को साल 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) को आवंटित किया गया था.