भारत में एसी का बढ़ता बाजार और गहराता संकट
छत्तीसगढ़ दुनिया भर में एसी की सबसे ज्यादा खपत भारत में है
रायपुर | ममता मानकरः इस बात पर कम ही लोग भरोसा करेंगे कि दुनिया में एयर कंडिशनर यानी एसी का सबसे बड़ा बाज़ार भारत है. कभी गर्मी में कूलर और पंखे में लिपटी नींद, अब एसी के रिमोट के बटन पर आ कर ठहर गई है.
1902 में विलिस कैरियर ने AC तो बनाया था, मगर उन्होंने ये नहीं सोचा होगा कि घर-दफ़्तर को ठंडा करने वाली ये मशीन धरती को गरम करता चला जाएगा.
भारत आज एसी का सबसे बड़ा बाज़ार बन चुका है और शायद सबसे बड़ा शिकार भी. इस देश में हर साल डेढ़ करोड़ एसी की बिक्री हो रही है.
दुनिया भर में जब जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर बहस चल रही है कि कैसे बिजली की खपत और रासायनिक गैसों के दुष्परिणामों से बचा जा सके, भारत दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता एसी का बाजार बन गया है.
अनुमान है कि 2050 तक देश में एक अरब से ज़्यादा एसी रूम होंगे. इससे कूलिंग के लिए बिजली की मांग अभी की तुलना में नौ गुना बढ़ सकती है. जो देश की ऊर्जा प्रणाली और जलवायु सुधार के लक्ष्यों के लिए यह खतरे की घंटी है.
कभी विलासिता में शामिल एसी अब मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए भी ज़रूरत का हिस्सा बन चुका है. एसी की बढ़ती संख्या ऊर्जा संकट और पर्यावरणीय विनाश की वजह भी बन सकती है.
साल में डेढ़ करोड़ एसी की बिक्री
भारत में इस एसी के बढ़ते बाज़ार का अनुमान आप इससे लगा सकते हैं कि नोएडा की हायर फैक्ट्री जैसी कंपनियां अब हर दो मिनट में एक नया एसी बना रही हैं.
कंपनी भारत में अपनी उत्पादन क्षमता को 15 लाख से बढ़ाकर 40 लाख यूनिट कर रही है.
पिछले साल रिकॉर्ड गर्मी में एसी की बिक्री 30% बढ़कर 1.4 करोड़ यूनिट हो गई, जिससे कंपनियों ने ₹45,000 करोड़ का राजस्व कमाया.
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और आराम की सुखद तलाश करने वाले लोगों के कारण भारत का एयर-कंडीशनर बाज़ार चार साल में दोगुना होकर डेढ़ करोड़ यूनिट हो गया है.
भारत में हीटिंग, वेंटिलेशन, एयर कंडीशनिंग और रेफ्रिजरेशन उद्योग अभूतपूर्व वृद्धि का अनुभव कर रहा है. पिछले साल अकेले आवासीय एयर कंडीशनिंग सेगमेंट की बिक्री में 35% की वृद्धि देखी गई.
वर्तमान में हर साल लगभग डेढ़ करोड़ एयर-कंडीशनर लगाए जाते हैं. जो चार साल पहले मात्र 70 लाख यानी दोगुने से भी ज़्यादा हैं. चूंकि भारत अगले दो दशकों में अपने बुनियादी ढांचे का विस्तार करना जारी रखेगा, इसलिए एयर-कंडीशनिंग, वेंटिलेशन और वायु शोधन की मांग और भी बढ़ेगी.
कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में जुटीं
ब्लू स्टार जैसी कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश कर रही हैं. ब्लू स्टार के मैनेजिंग डायरेक्टर, बी. थियागराजन ने कहा कि छोटे शहरों में मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे पहली बार खरीदने वाले उपभोक्ताओं और प्रतिस्थापन चक्रों के कारण एसी की मांग बढ़ी है.
हालांकि, बढ़ती मांग के कारण कुछ मॉडलों की आपूर्ति में कमी देखी गई है और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण अगली तिमाही में कीमतों में 2-3% की वृद्धि हो सकती है.
कुल मिलाकर, भारत में बढ़ते तापमान और बदलती जीवनशैली के कारण एसी और कूलर की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है. जिससे कंपनियां अपनी उत्पादन और विपणन रणनीतियों को दोबारा निर्धारित कर रही हैं.
गर्मी के बढ़ते तापमान के कारण, भारत में एयर कंडीशनर और कूलर की बिक्री में जबरदस्त वृद्धि देखी गई है. कंपनियों का कहना है कि बिजली की स्थिर आपूर्ति और घरों में एसी की कम पहुंच लगभग 7-8% लोगों को ठंडक देने वाले उपकरण खरीदने के लिए प्रेरित कर रही है.
लंबे और गर्म होते जा रहे ग्रीष्मकाल के कारण, विभिन्न आय वर्ग के उपभोक्ता इन उत्पादों को खरीद रहे हैं. कुछ तो अन्य बड़े उपकरणों की तुलना में एसी को प्राथमिकता दे रहे हैं.
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते तापमान, शहरीकरण, बढ़ती आय और उपभोक्ता वित्तपोषण विकल्पों के कारण आने वाले वर्षों में इन उपकरणों की मांग बढ़ेगी. एसी एक कम पहुंच वाली श्रेणी है, लेकिन बढ़ती आय, बिजली की उपलब्धता और किफायती ऑफर के कारण इसकी अपनाने की दर बढ़ रही है.
घरों की डिजाइन भी एसी को ध्यान में रखते हुए
सीईपीटी विश्वविद्यालय के रिसर्च के मुताबिक एसी का चलन तेजी से बढ़ रहा है. भारत में एयर कंडीशनर अब कोई 'लग्जरी' नहीं रह गया है. जैसे-जैसे शहरों में गर्मी का स्तर बढ़ रहा है और लोग बेहतर जीवनशैली अपनाने लगे हैं, वैसे-वैसे एसी की मांग भी तेज़ी से बढ़ रही है.
घरों के डिजाइन भी एसी पर निर्भर होने लगे हैं. कई नए अपार्टमेंट और घर अब ऐसे डिज़ाइन किए जा रहे हैं, जिसमें एसी लगाना पहले से ही तय होता है.
यानी अब मकान ऐसे बन रहे हैं कि बिना एसी के गर्मी झेलना मुश्किल हो जाता है. यह एक 'ठंडेपन की लत' जैसी स्थिति बना रहा है. रिसर्च में इसे कूलिंग एडिक्शन यानी ठंडी हवा की लत जैसा बताया गया है.
एक बार जब लोग एसी के आराम के आदी हो जाते हैं, तो बिना उसके रहना उनके लिए मुश्किल हो जाता है. अगर बाहर मौसम ठीक हो तो भी स्थिति ऐसी ही बनी रहती है.
घरों से गायब होती प्राकृतिक ठंडक
घरों से प्राकृतिक ठंडक के उपाय गायब हो रहे हैं, पहले घरों को ऐसे बनाया जाता था कि खिड़की, वेंटिलेशन, और छायादार पेड़ों से गर्मी कम हो जाती थी. अब एसी पर निर्भरता के कारण लोग इन उपायों को नजरअंदाज कर रहे हैं.
भारत में यह एक प्रकार का सामाजिक बदलाव भी है. अब घरों में यह देखा जाने लगा है कि कौन एसी चला रहा है और कौन नहीं. यह एक सामाजिक स्थिति या स्टेट्स सिंबल बनता जा रहा है.
बिजली खपत और तापमान में वृद्धि
एक तरफ यह एसी घर और दफ्तर को ठंडा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यह धरती को गर्म कर रहा है. एसी के कारण होने वाली ज्यादा बिजली की खपत से ऊर्जा पर दबाव बढ़ रहा है.
शोध बताते हैं कि जैसे-जैसे एसी की मांग बढ़ेगी, बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ेगी.
जिससे बिजली नेटवर्क पर भारी बोझ पड़ेगा. एसी के कारण पैदा होने वाली गरमी, बिजली की अधिक खपत के कारण बढ़ने वाला तापमान, आने वाले दिनों में और गहरा सकता है.
समाधान विकसित करने की कोशिश
ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक इस समस्या को नहीं समझ रहे हैं. लेकिन यह भी सच है कि कूलिंग तकनीक की मूल संरचना यानी बैक-बॉन में पिछले सौ सालों से कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.
हालांकि अब कुछ कंपनियां पुराने तरीकों जैसे वाष्पीकरण शीतलन यानी इवेपरेटिव कूलिंग को आधुनिक कंप्रेसर तकनीक के साथ मिलाकर ऐसा समाधान विकसित करने की कोशिश कर रही हैं, जिससे ऊर्जा की खपत कम हो सके.
इसे ध्यान में रखते हुए अक्टूबर 2023 में मुंबई के पास स्थित 'पलावा सिटी' में एक विशेष प्रयोग किया गया. यहाँ नौ महीनों तक नए तरह के एयर कंडीशनर का परीक्षण किया गया, जिसे 'सुपर एफिशिएंट एसी' कहा गया.
यह प्रयोग रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट (आर एम आई) सीईपीटी विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी और लोया समूह द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था.
इस तकनीक ने पारंपरिक एसी की तुलना में 60% कम बिजली की खपत की और बिजली बिल को आधे से भी कम करने की क्षमता दिखाई.
लेकिन यह एसी सामान्य एसी से अलग है. इन सुपर एसी में वही सामान्य घटक हैं जो आज के एसी में होते हैं, लेकिन ये सेंसर और बेहतरीन डिजाइन की मदद से वास्तविक स्थितियों यानी टेंपरेचर के अनुसार खुद को ढालते हैं.
इनका कंप्रेसर अधिक कुशल है और क्वाइल डिजाइन भी बेहतर है. हालांकि इनकी कीमत अधिक हो सकती है, लेकिन चार साल के भीतर यह खर्च वसूल हो सकता है.
इसी तरह हैदराबाद की कंपनी एम्बिएटर ने वाष्पीकरण तकनीक को आधुनिक बना कर ऐसा कूलर तैयार किया है, जो एसी जैसी ठंडक देता है लेकिन बिजली की खपत बहुत कम करता है.
फ्लोरिडा की ब्लू फ्रंटियर कंपनी नमी हटाने के लिए डेसीकेंट्स का उपयोग करती है, जिससे कंप्रेशर की जरूरत कम हो जाती है. ब्रिटेन की बारोकल नाम की कंपनी ठोस अवस्था वाले कूलिंग सिस्टम पर काम कर रही है, जो रसायनों के बजाय जैविक क्रिस्टल से ठंडक देती है.
इसी तरह रहा तो सुविधा संकट बन जायेगी
समाधान केवल नई तकनीकों में ही नहीं, बल्कि नीतिगत बदलाव और जवाबदेह उपभोग में छिपा है. आखिरकार, दुनिया को पुरानी कूलिंग तकनीक से अब उस क्रांति की ज़रूरत है जो न केवल इंसान को राहत दे, बल्कि पृथ्वी को भी सुरक्षित रखे.
बात साफ है कि बढ़ती गर्मी से लड़ने के लिए अगर हम सिर्फ एसी की पनाह लेंगे, तो ये राहत ज्यादा दिन नहीं टिकेगी.
भारत आज 'कूलिंग क्रांति' के केंद्र में है, लेकिन हमें ठंडक से पहले सूझबूझ अपनाने की ज़रूरत है. ठंडी हवा के पीछे भागते हुए अगर हमने धरती की ज़रूरत और जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया, तो ये सुविधा बहुत जल्द संकट बन जाएगी.