PSC की चयन प्रक्रिया पर सरकार खुद की समानांतर जांच नहीं थोप सकती- SC
नई दिल्ली । डेस्क: पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा योग्य ठहराए गए और अनुशंसित उम्मीदवार की पात्रता पर राज्य सरकारें अपनी ओर से कोई नई या विस्तृत जांच नहीं बिठा सकती हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि सेवा नियमों में आयोग के फैसले को अंतिम माना गया है, तो नियुक्ति प्राधिकारी को विशेषज्ञ संस्था के वैधानिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करने का कोई अधिकार नहीं है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने माना कि यद्यपि चयन सूची में नाम शामिल होने मात्र से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का निरपेक्ष अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन सरकारें मनमाने ढंग से आयोग की सिफारिशों को खारिज भी नहीं कर सकती हैं.
अनुभव के मापदंड पर शुरू हुआ विवाद
मामला छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) द्वारा 9 फरवरी 2021 को राज्य के विश्वविद्यालयों में रजिस्ट्रार के तीन पदों के लिए निकाली गई भर्ती से जुड़ा है. इसमें वर्ष 2016 से उप-रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत डॉ. शैलेंद्र कुमार पटेल ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में आवेदन किया था. आयोग ने विषय विशेषज्ञों की देखरेख में उनके शैक्षणिक दस्तावेजों और अनुभव की गहन जांच के बाद उन्हें परीक्षा तथा साक्षात्कार में शामिल होने की अनुमति दी. 30 सितंबर 2021 को जारी चयन सूची में डॉ. पटेल ने अपनी श्रेणी में पहला स्थान हासिल किया, जिसके बाद आयोग ने 7 अक्टूबर 2021 को सरकार को उनकी नियुक्ति की सिफारिश भेजी.
हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद जांच समिति गठित
आयोग की स्पष्ट सिफारिश और विभागीय पदोन्नति समिति द्वारा उपयुक्त पाए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने डॉ. पटेल को नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया. जब डॉ. पटेल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो अदालत ने सरकार को चार हफ्ते के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया. इसके बावजूद सरकार ने आदेश का पालन करने के स्थान पर एक तीन-सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया. इस समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि डॉ. पटेल के पास निर्धारित वेतनमान में आवश्यक अनुभव नहीं है और 31 अक्टूबर 2022 को सरकार ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया. बाद में हाईकोर्ट की एकल और खंडपीठ ने भी राज्य सरकार के इस रुख को सही ठहराया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई.
सत्यापन के नाम पर नई जांच की इजाजत नहीं
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए माना कि छत्तीसगढ़ राज्य विश्वविद्यालय सेवा नियम, 1983 के नियम 10 के तहत उम्मीदवारों की पात्रता का निर्धारण करने का अंतिम अधिकार लोक सेवा आयोग को प्राप्त है. अदालत ने स्पष्ट किया कि नियुक्ति से पहले दस्तावेजों का सत्यापन केवल प्रमाण पत्रों की प्रामाणिकता और किसी प्रत्यक्ष या स्पष्ट त्रुटि की जांच तक ही सीमित होता है. इसके आड़ में सरकार पूरी चयन प्रक्रिया की नए सिरे से व्यक्तिपरक समीक्षा शुरू नहीं कर सकती. पीठ ने कहा कि यदि सरकार को पात्रता को लेकर कोई संदेह था भी, तो नियम के मुताबिक मामले को पुनः आयोग के पास भेजा जाना चाहिए था, न कि अपनी खुद की समिति बनाकर फैसला सुनाया जाता.
तीन हफ्ते में नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश
शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले को रद्द करते हुए डॉ. शैलेंद्र कुमार पटेल की याचिका को स्वीकार कर लिया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस जांच रिपोर्ट और अयोग्य ठहराने वाले आदेश को गैर-कानूनी घोषित कर दिया. अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया है कि वह डॉ. पटेल को तीन सप्ताह के भीतर राज्य के किसी भी विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्ति पत्र जारी करे. इसके साथ ही उन्हें उनके साथ चयनित हुए अन्य उम्मीदवारों की नियुक्ति तिथि से ही वरिष्ठता और सभी सेवा लाभ प्रदान किए जाएंगे, हालांकि बकाया वेतन के भुगतान पर कुछ सीमित शर्तें लागू रहेंगी.