कभी डायनासोरों को निगलने वाले दैत्याकार मगरमच्छ धरती पर थे
नई दिल्ली । डेस्क: डायनासोर युग में धरती पर ऐसे शिकारी भी थे, जिनसे खुद विशालकाय डायनासोर तक नहीं बच पाते थे. इन्हीं में से एक था डिनोसुकस स्क्विमेरी, एक ऐसा दैत्याकार प्रागैतिहासिक मगरमच्छ, जो अधिकतर समय पानी में रहता था और अपने दौर के सबसे खतरनाक शिकारियों में गिना जाता था. दशकों की खोज और अध्ययन के बाद अब वैज्ञानिकों ने पहली बार इसके पूरे शरीर का सटीक रूप सामने लाने में सफलता हासिल की है.
डिनोसुकस स्क्विमेरी दिखने में आज के मगरमच्छ जैसा ही था, लेकिन आकार में वह आधुनिक मगरमच्छों से कई गुना बड़ा था. इसकी शारीरिक बनावट एलिगेटर से मिलती-जुलती थी, खासकर इसकी ‘यू’ आकार की चौड़ी थूथन. वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी लंबाई लगभग 32 फीट तक होती थी, जबकि आज के एलिगेटर औसतन 11 से 14 फीट लंबे होते हैं. माना जाता है कि यही दैत्याकार मगरमच्छ आधुनिक एलिगेटर के निकट संबंधी पूर्वज थे.
यह प्रजाति करीब 8 करोड़ 30 लाख से 7 करोड़ 60 लाख साल पहले धरती पर मौजूद थी. इसके जीवाश्म मुख्य रूप से अमेरिका के विभिन्न हिस्सों में मिले हैं. विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी अमेरिका की नदियों और तटीय दलदली क्षेत्रों में इनका बसेरा था. इसके जीवाश्म नमूने आज वॉशिंगटन के स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन, न्यूयॉर्क के अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री और जॉर्जिया के टेलस साइंस म्यूजियम में सुरक्षित रखे गए हैं.
कोलंबस स्टेट यूनिवर्सिटी के भूविज्ञान प्रोफेसर और मगरमच्छ विशेषज्ञ डेविड स्क्विमर पिछले चार दशकों से इन जीवाश्मों पर शोध कर रहे हैं. हालांकि जीवाश्म काफी पहले मिल गए थे, लेकिन इस प्रजाति का औपचारिक नामकरण वर्ष 2020 में हुआ और इसे डेविड स्क्विमर के सम्मान में डिनोसुकस स्क्विमेरी नाम दिया गया. लंबे समय तक इसके पूरे शरीर की कल्पना संभव नहीं थी, क्योंकि जीवाश्म टुकड़ों में ही मिले थे.
अब इन सभी जीवाश्मों का गहन विश्लेषण कर वैज्ञानिकों ने इसका पूर्ण प्रतिरूप तैयार किया है, जिसे जॉर्जिया के टेलस साइंस म्यूजियम में प्रदर्शित किया गया है. यह प्रतिरूप दिखाता है कि यह मगरमच्छ आकार में लगभग एक बस जितना लंबा था. इसके जबड़े इतने विशाल थे कि एक वयस्क इंसान का आधा शरीर आसानी से समा सकता था. इसके दांत करीब 10 इंच लंबे होते थे, जिनसे यह छोटे डायनासोरों को भी अपना शिकार बना लेता था.
वैज्ञानिकों का कहना है कि डायनासोरों के जीवाश्मों में पाए गए दांतों के निशान बताते हैं कि यह शिकारी अक्सर उनके पैरों और पूंछ पर हमला करता था. यह खोज इस धारणा को भी तोड़ती है कि मगरमच्छ करोड़ों सालों से बिना बदले हुए हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, डिनोसुकस स्क्विमेरी इस बात का प्रमाण है कि मगरमच्छ भी समय के साथ अन्य जीवों की तरह विकसित और परिवर्तित हुए हैं.
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