गाजा शांति योजना खारिज: क्यों बिगड़ी बात और क्या हैं इसके मायने?
नई दिल्ली । डेस्क: मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए अमेरिका द्वारा पेश किए गए महत्वाकांक्षी 15-सूत्रीय शांति रोडमैप को लेकर एक नया कूटनीतिक संकट पैदा हो गया है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इस शांति दस्तावेज को सिरे से खारिज कर दिया है. इजरायली नेतृत्व का स्पष्ट रुख है कि जब तक गाजा में सक्रिय सशस्त्र समूह हमास पूरी तरह से और वास्तविक रूप से अपने हथियार नहीं डाल देता, तब तक इजरायली रक्षा बल गाजा पट्टी से पीछे नहीं हटेंगे. इस फैसले के बाद क्षेत्र में युद्धविराम और मानवीय राहत की उम्मीदों पर एक बार फिर पानी फिरता नजर आ रहा है.
ट्रम्प की 15-सूत्रीय योजना और इजरायल का कड़ा रुख
अमेरिकी नेतृत्व वाले 'बोर्ड ऑफ पीस' द्वारा तैयार किए गए इस शांति दस्तावेज में गाजा के पुनरुद्धार और स्थायी शांति के लिए चरणबद्ध व्यवस्था की रूपरेखा रखी गई थी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के तहत समर्थित इस योजना का मुख्य उद्देश्य हमास के निरस्त्रीकरण के बदले इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी और गाजा का शासन एक स्वतंत्र 'फिलिस्तीनी राष्ट्रीय समिति' को सौंपना था. इस संक्रमणकालीन व्यवस्था में सुरक्षा बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति सेना की तैनाती का प्रावधान भी शामिल किया गया था.
हालांकि, कैबिनेट बैठक के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इजरायल केवल कागजी या दिखावटी निरस्त्रीकरण को स्वीकार नहीं करेगा. उनका तर्क है कि सुरक्षा गारंटी के बिना सेना की वापसी इजरायली नागरिकों और सीमा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती है. नेतन्याहू का यह कड़ा बयान उनके अपने ही देश में अक्टूबर में होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले आया है, जिससे उनके राजनीतिक रुख में और ज्यादा सख्ती देखने को मिल रही है.
फिलिस्तीनी नागरिकों की प्रतिक्रिया और अनिश्चितता का माहौल
दूसरी ओर, गाजा में लगातार तबाही झेल रहे आम फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए इजरायल का यह फैसला कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है. गाजा के स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस योजना के खारिज होने से क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता की बची-कुची उम्मीदें भी खत्म हो गई हैं. योजना के लागू होने से हिंसा थमने और राहत सामग्री पहुंचने का जो ढांचा तैयार होने की उम्मीद थी, वह अब पूरी तरह से ठप होता दिख रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि यह रोडमैप काफी हद तक अमेरिकी और इजरायली सुरक्षा प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करता था, फिर भी इसे युद्ध रोकने के एकमात्र साधन के रूप में देखा जा रहा था. अब इस प्रस्ताव के रुक जाने से गाजा में मानवीय संकट और गहराने की आशंका बन गई है, जहां लगातार जारी हमलों और सैन्य अभियानों के कारण स्थिति पहले से ही बेहद नाजुक बनी हुई है.
विशेषज्ञों की राय: चुनावी रणनीति या अनकहा गतिरोध?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और पूर्व कूटनीतिज्ञों का आकलन है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे इजरायल की घरेलू राजनीति की बड़ी भूमिका है. आगामी चुनावों में कड़े मुकाबले का सामना कर रहे नेतन्याहू अपने दक्षिणपंथी वोट बैंक को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं. विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नेतन्याहू का यह कदम अमेरिकी प्रशासन के साथ एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल हो सकता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वाशिंगटन इस मुद्दे पर अभी कोई सख्त रुख नहीं अपनाएगा.
दूसरी तरफ, यह गतिरोध दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की उस गहरी खाई को भी उजागर करता है जो दशकों से बनी हुई है. जब तक हमास के निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया और इजरायली सेना की वापसी के समय को लेकर कोई ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक गाजा में स्थायी शांति की कोई भी कोशिश कागजों तक ही सीमित रहने की संभावना है.