डॉक्टरों को मुफ़्त तोहफ़े: SC ने फ़ार्मा मार्केटिंग पर नियम बनाने एक कमेटी बनाने कहा
नई दिल्ली । डेस्क: दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच अनैतिक सांठगांठ तथा उपहारों के लेनदेन पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है. अदालत ने केंद्र सरकार को एक विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो फार्मास्युटिकल कंपनियों के अनैतिक विपणन (मार्केटिंग) अभ्यासों को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक नियम बनाने के संबंध में अपनी सिफारिशें सौंपेगी.
यह याचिका 'फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसियेशन्स ऑफ इंडिया' (FMRAI) और अन्य संगठनों द्वारा दायर की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह गंभीर मुद्दा उठाया था कि जहां एक तरफ डॉक्टरों के लिए उपहार स्वीकार करने पर दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं, वहीं दूसरी तरफ रिश्वत देने वाली दवा कंपनियों पर शिकंजा कसने के लिए कोई मजबूत कानून उपलब्ध नहीं है.
विद्यमान व्यवस्था में खामियां और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि उपलब्ध आंकड़ों और तथ्यों से साफ स्पष्ट होता है कि वर्तमान नियामक ढांचा अनैतिक प्रथाओं को रोकने में पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हुआ है. अदालत ने रेखांकित किया कि स्वास्थ्य सेवा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियमों की प्रभावशीलता केवल कागजी मानकों से नहीं आंकी जा सकती, बल्कि यह उनकी ज़मीनी क्रियान्वयन और प्रवर्तन क्षमता पर निर्भर करती है.
वर्ष 2024 के 'यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज' (UCPMP) की प्रभावकारिता पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि जब तक इस कोड को वैधानिक संरक्षण नहीं मिलता, तब तक यह काफी हद तक स्वैच्छिक ही बना रहेगा. इसके साथ ही अदालत ने 2022 के 'एपेक्स लेबोरेटरीज' मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी टिप्पणी की थी कि मुफ्त उपहार, इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश यात्राओं की आड़ में दवा कंपनियां डॉक्टरों के पर्चों को प्रभावित करती हैं, जिससे आम जनता पर वित्तीय और शारीरिक बोझ पड़ता है.
शक्तियों का पृथक्करण और कार्यपालिका की जिम्मेदारी
फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत का विशेष रूप से ध्यान रखा. पीठ ने माना कि नीति निर्माण, विधायी ढांचे का चयन और प्रवर्तन तंत्र तैयार करना प्राथमिक रूप से कार्यपालिका और विधायिका का अधिकार क्षेत्र है. संघ सरकार इस प्रकार के जटिल विषयों और प्रतिस्पर्धी पहलुओं का मूल्यांकन करने के लिए संस्थागत रूप से अधिक सक्षम है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य नीति बनाना नहीं, बल्कि एक पारदर्शी और प्रभावी परामर्श प्रक्रिया को सुगम बनाना है. न्यायपालिका यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जो भी नया नियामक ढांचा तैयार हो, वह नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का पूरी तरह से पालन करे.
कमेटी का गठन, कार्यक्षेत्र और समयसीमा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, गठित की जाने वाली यह समिति अनैतिक विपणन पद्धतियों से जुड़े सभी पहलुओं का व्यापक अध्ययन करेगी. समिति वर्तमान में मौजूद वैधानिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करेगी और इस प्रक्रिया में याचिकाकर्ताओं, हस्तक्षेपकर्ताओं तथा अन्य संबंधित हितधारकों को अपनी बात रखने का अवसर देगी. इसके अतिरिक्त, समिति तकनीकी और क्षेत्र-विशेष के विशेषज्ञों से भी परामर्श ले सकती है.
ठोस परिणाम सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त समयसीमा तय की है. कमेटी को अपनी पहली बैठक के बाद से दो महीने के भीतर अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपनी होंगी. इसके उपरांत, केंद्र सरकार को उन सिफारिशों पर विचार करते हुए जनहित और संविधान के अनुच्छेद 21 को ध्यान में रखकर तर्कसंगत निर्णय लेना होगा.
अनुपालन हलफनामा और अगली सुनवाई
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी आदेश दिया है कि वह समिति के गठन, उसकी पहली बैठक की तारीख, परामर्श प्रक्रिया के विवरण, सिफारिशों और उन पर लिए गए सरकारी निर्णयों की पूरी रिपोर्ट एक अनुपालन हलफनामे (कंपलायंस एफिडेविट) के माध्यम से अदालत में पेश करे.
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जा रहा है जो वैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता का बारीकी से परीक्षण करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले इस अनुपालन हलफनामे पर विचार करने के लिए इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है.