फ्रांस: शिक्षा सुधारों को लेकर भड़का छात्र आंदोलन, हाई स्कूल बंद करने का ऐलान
नई दिल्ली । डेस्क: फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों की मांग को लेकर छात्रों का प्रदर्शन अब एक देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है. स्थिति की गंभीरता और बढ़ते तनाव को देखते हुए फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू (Sebastien Lecornu) ने इस हफ्ते के बाकी बचे दिनों के लिए देशभर के सभी हाई स्कूलों में कक्षाओं को निलंबित (रद्द) करने की घोषणा कर दी है. प्रधानमंत्री का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य प्रधानाचार्यों, शिक्षकों और छात्रों को आपसी संवाद और "आंतरिक लोकतंत्र" के जरिए अपनी समस्याओं का समाधान खोजने का अवसर देना है.
छात्र आंदोलन का विस्तार और मुख्य मांगे
यह आंदोलन करीब दो हफ्ते पहले पेरिस के पिछड़े और गरीब इलाकों से शुरू हुआ था, जो देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया. छात्र मुख्य रूप से स्कूलों में अनुपस्थित शिक्षकों की जगह नए शिक्षकों की नियुक्ति, लंच ब्रेक का समय बढ़ाने, स्कूल के घंटों में बदलाव और जर्जर हो चुकी स्कूल इमारतों की मरम्मत जैसी बुनियादी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे हैं.
छात्र यूनियनों का दावा है कि देशभर में लगभग 2,000 हाई स्कूलों को छात्रों ने पूरी तरह से जाम या बंद कर दिया है. रैलियों में आयोजकों के अनुसार करीब 5 लाख छात्रों और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया, जबकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग ढाई लाख रही.
कई शहरों में हिंसा और पुलिस का बल प्रयोग
पेरिस, मार्सेली, नंत, ल्योन, स्ट्रासबर्ग और रेनेस जैसे प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने "वे वास्तव में हमारी परवाह नहीं करते" और "जीवित रहें या पढ़ाई करें" जैसे संदेश लिखे बैनर ले रखे थे. स्ट्रासबर्ग, ल्योन और रेनेस में प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया, जहां युवाओं ने सड़कों पर आगजनी की और पुलिस पर पथराव किया.
इसके जवाब में दंगा नियंत्रण पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े. स्ट्रासबर्ग में प्रदर्शन कर रहे एक छात्र ह्युगो वेटजेल ने निराशा जताते हुए कहा कि जब मांगों का जवाब हिंसा से दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि लोकतंत्र अब काम नहीं कर रहा है; जनता और संभ्रांत वर्ग (एलीट) के बीच खाई बहुत गहरी हो चुकी है.
नागरिक संगठनों का समर्थन और बढ़ा तनाव
प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने के बाद अब छात्रों के समर्थन में किसान यूनियनों, ऊर्जा कर्मचारियों, शिक्षकों और अभिभावकों के संगठन भी उतर आए हैं. अभिभावकों का कहना है कि वे न केवल मांगों का समर्थन करने आए हैं, बल्कि अपने बच्चों को उपद्रवियों और पुलिस की अत्यधिक सख्ती से बचाने के लिए भी उनके साथ खड़े हैं.
भारी नुकसान, गिरफ्तारियां और घायलों के आंकड़े
आंदोलन के दौरान अब तक बड़े पैमाने पर नुकसान और गिरफ्तारियां दर्ज की गई हैं. आंतरिक मंत्रालय के अनुसार, प्रदर्शनों के सिलसिले में अब तक 6,100 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें से अधिकांश 18 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग हैं. इसके अलावा 1,800 से अधिक लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जा रही है.
हिंसक झड़पों में कम से कम 215 छात्र और 715 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. उत्तरी शहर लेंस में एक 15 वर्षीय छात्र का हाथ पुलिस ग्रेनेड उठाने के दौरान हुए विस्फोट में कट गया, जिससे आक्रोश और बढ़ गया है.
सरकार की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय बयानबाजी
फ्रांसीसी सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों को जलाना किसी समस्या का हल नहीं है, फिर भी उसने आश्वासन दिया है कि अक्टूबर के अंत तक छात्रों की जायज मांगों पर विचार किया जाएगा. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस वर्तमान में भारी वित्तीय कर्ज और बजट संकट से जूझ रहा है, ऐसे में सार्वजनिक शिक्षा क्षेत्र के लिए भारी धन जुटाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगा.
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर टिप्पणी करते हुए बिना किसी सबूत के इस प्रदर्शन का कारण अत्यधिक प्रवासन और मुस्लिम आबादी को बताया है, जिसकी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों द्वारा तीखी आलोचना की जा रही है.