रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

भारत के न्यायाधीश बने दुनिया में न्याय की नई उम्मीद

C

CG Khabar

08 जुल. 2026, 06:48 PM 4 मिनट में पढ़ें 4

एस. मुरलीधर
एस. मुरलीधर

नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय न्यायपालिका में अपनी ईमानदारी और कड़े फैसलों के लिए मशहूर रहे दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चर्चा के केंद्र में हैं. साल 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान पीड़ितों की मदद करने और एक सत्ताधारी नेता के खिलाफ सख्त आदेश देने के बाद रातों-रात ट्रांसफर कर दिए गए जस्टिस मुरलीधर आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवता की आवाज बनकर उभरे हैं. 


64 वर्षीय सेवानिवृत्त न्यायाधीश वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र (UN) के उस स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के अध्यक्ष हैं, जिसने गाजा में इजरायली सैन्य अभियानों के दौरान बच्चों को निशाना बनाए जाने को लेकर अब तक की सबसे विस्तृत और झकझोर देने वाली रिपोर्ट जारी की है.

विज्ञापन


दो साल के युद्ध में 20 हजार से अधिक बच्चों की मौत: संयुक्त राष्ट्र की दहला देने वाली रिपोर्ट:


संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा गठित इस आयोग ने अपनी 94 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट में अक्टूबर 2023 से अक्टूबर 2025 के बीच गाजा और वेस्ट बैंक में बच्चों के खिलाफ हुए मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण किया है. रिपोर्ट के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं. जस्टिस मुरलीधर के नेतृत्व वाले आयोग ने पाया कि दो साल के इस भीषण युद्ध में कम से कम 20,179 फिलिस्तीनी बच्चे मारे गए हैं, जो कुल मौतों का लगभग 30 प्रतिशत है. 


इसके अलावा, 44,000 से अधिक बच्चे घायल हुए हैं और लगभग 58,000 बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ चुका है. रिपोर्ट में स्नाइपर्स और सटीक ड्रोन हमलों के जरिए बच्चों को निशाना बनाने, मानवीय सहायता रोककर भुखमरी फैलाने और नवजात शिशुओं की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं.


'मानवता के खिलाफ अपराध': इजरायल के दावों को जस्टिस मुरलीधर ने किया खारिज:


जस्टिस मुरलीधर ने अल जजीरा को दिए एक इंटरव्यू में साफ कहा कि सबूत बताते हैं कि फिलिस्तीनी बच्चों को इजरायली सुरक्षा बलों द्वारा जानबूझकर निशाना बनाया गया और मारा गया. उन्होंने इजरायल के उस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें हमास द्वारा बच्चों को 'मानव ढाल' के रूप में इस्तेमाल करने की बात कही जाती रही है. 


जस्टिस मुरलीधर ने इसे एक 'मिथक' करार देते हुए कहा कि मारे गए अधिकांश बच्चे अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त थे, न कि किसी युद्ध जैसी गतिविधि में शामिल थे. 


आयोग ने वैश्विक समुदाय से सिफारिश की है कि वे इजरायल को हथियारों की आपूर्ति तुरंत रोकें और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा वांछित इजरायली अधिकारियों, जिनमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी शामिल हैं, की गिरफ्तारी सुनिश्चित करें.


भारत-इजरायल रक्षा संबंधों के बीच खड़ी हुई असहज स्थिति:


यह रिपोर्ट वैश्विक कूटनीति के लिहाज से भारत के लिए भी एक बेहद संवेदनशील और असहज स्थिति पैदा करती है. पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत और इजरायल के बीच रणनीतिक और रक्षा संबंध अप्रत्याशित रूप से मजबूत हुए हैं. भारत वर्तमान में इजरायल के रक्षा निर्यात का सबसे बड़ा खरीदार है. 


इसके अलावा, कई प्रमुख भारतीय कंपनियां इजरायली फर्मों के साथ मिलकर भारत में ही आधुनिक ड्रोन और सैन्य उपकरण बना रही हैं. 


जब जस्टिस मुरलीधर से भारत और इजरायल के इन व्यापारिक गठबंधनों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस युद्ध की जवाबदेही केवल भारत की नहीं है, बल्कि दुनिया के हर उस देश या कंपनी की है जो हथियारों या लॉजिस्टिक्स के माध्यम से इस युद्ध को जारी रखने में मदद कर रही है. उनके अनुसार, युद्ध की जिम्मेदारी सीमाओं पर नहीं रुकती.


देश में नहीं मिला सुप्रीम कोर्ट का सम्मान, पर दुनिया ने माना लोहा:


जस्टिस मुरलीधर का पूरा करियर मानवाधिकारों और हाशिए पर मौजूद लोगों के हक में आवाज उठाने का रहा है. उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों से लेकर नर्मदा बांध विस्थापन के शिकार आदिवासियों तक के लिए वकालत की. न्यायाधीश के रूप में उन्होंने 1984 के सिख विरोधी दंगों और 1987 के हाशिमपुरा कांड के दोषियों को सजा सुनाकर न्याय की मिसाल पेश की थी.


फरवरी 2020 में जब दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, तब उन्होंने आधी रात को अपने घर पर अदालत लगाकर घायल मरीजों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाने का ऐतिहासिक आदेश दिया था. इसके अगले ही दिन जब उन्होंने नफरत भरे भाषण देने वाले नेताओं के खिलाफ पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया, तो उसी रात सरकार ने उनका तबादला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट कर दिया. 


कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज का मानना है कि सत्ता के खिलाफ खड़े होने की इसी हिम्मत के कारण उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे और उन्हें कभी सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नहीं बनाया गया. हालांकि, आज संयुक्त राष्ट्र ने उनकी उसी काबिलियत और निष्पक्षता पर भरोसा जताते हुए उन्हें इस ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील जांच की कमान सौंपी है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP