भारत में कोल गैसीफिकेशन के लिए विदेशी निवेश को मिलेगा वित्तीय प्रोत्साहन
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्र सरकार देश के कोयला गैसीफिकेशन क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश और वैश्विक तकनीक को आकर्षित करने की तैयारी में है. केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बुधवार को घोषणा की कि सरकार उन विदेशी संस्थाओं को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करेगी जो भारत के कोल गैसीफिकेशन परिदृश्य में निवेश करेंगी.
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रोत्साहन केवल तकनीक हासिल करने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि कंपनियों द्वारा किए गए वास्तविक निवेश के आधार पर दिया जाएगा.
केंद्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत प्राकृतिक गैस के आयात पर अपनी निर्भरता कम करने और गहरे कोयला भंडारों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने के लिए पारंपरिक खनन के विकल्प के रूप में कोल गैसीफिकेशन को तेजी से बढ़ावा दे रहा है.
रेड्डी के अनुसार, कोयला मंत्रालय वर्तमान में अन्य संबंधित मंत्रालयों के साथ मिलकर प्रोत्साहन पैकेजों को अंतिम रूप देने पर काम कर रहा है.
उन्होंने वैश्विक कंपनियों को आमंत्रित करते हुए कहा कि भारत उनके लिए निवेश का एक बड़ा केंद्र साबित होगा, चाहे वह सतह पर होने वाला गैसीफिकेशन हो या भूमिगत.
वहीं, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कोयले की कीमतों पर मंत्रालय कड़ी नजर रखे हुए है और राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि कीमतों को नियंत्रण में रखा जाए ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे.
गौरतलब है कि कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) एक ऐसी आधुनिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे रसायनों की मदद से गैस में बदल दिया जाता है. इस प्रक्रिया में कोयले को ऑक्सीजन, भाप या हवा के साथ नियंत्रित स्थिति में गर्म किया जाता है, जिससे वह 'सिनगैस' (Syngas) नामक मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है.
यह सिनगैस मुख्य रूप से हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड का मेल होती है. इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो कोयला जमीन के बहुत अंदर है और जिसे पारंपरिक तरीके से खोदकर निकालना मुश्किल या महंगा है, उसे भी गैसीकरण के जरिए ऊर्जा में बदला जा सकता है.
इस गैस का उपयोग बिजली बनाने, यूरिया जैसे उर्वरक तैयार करने और विभिन्न प्रकार के रसायनों व स्वच्छ ईंधन के निर्माण में किया जाता है. इससे प्रदूषण भी कम होता है क्योंकि गैस बनने के दौरान सल्फर और राख जैसी अशुद्धियों को पहले ही अलग कर लिया जाता है.
दुनिया भर में कोयला गैसीकरण का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और वर्तमान में चीन इस तकनीक का सबसे बड़ा उपयोग करने वाला देश है. चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों और रासायनिक उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर कोल गैसीफिकेशन प्लांट संचालित करता है.
इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका भी इस क्षेत्र में काफी आगे है, जहाँ 'सासोल' (Sasol) जैसी कंपनियां कोयले से तरल ईंधन बनाने के लिए इस तकनीक का दशकों से इस्तेमाल कर रही हैं.
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और जापान में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं जो बिजली उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा के लिए इस प्रक्रिया को अपना रही हैं.
भारत में भी इसे भविष्य के गेम-चेंजर के रूप में देखा जा रहा है और सरकार ने ओडिशा के लखनपुर जैसी जगहों पर स्वदेशी तकनीक (BHEL द्वारा विकसित) और विदेशी निवेश के माध्यम से बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू कर दिया है. रूस और जर्मनी जैसे देशों में भी तकनीकी शोध और सीमित स्तर पर इसके संयंत्र मौजूद हैं.