FIR दर्ज होना दुराचार नहीं, वार्षिक इंक्रीमेंट रोका नहीं जा सकता: HC
चंडीगढ़ । डेस्क: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होने मात्र से ही दुराचार साबित नहीं होता और इसी आधार पर उसके वार्षिक इंक्रीमेंट को रोकना गैरकानूनी है. यह फैसला 23 सितंबर 2025 को सीडब्ल्यूपी-17435-2024 मामले में आया, जिसमें एक क्लर्क ने नौकरी और प्रमोशन के अधिकारों के लिए अपील की थी.
मामला पंजाब स्टेट सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन के एक क्लर्क का है, जिसे 20 सितंबर 2001 को पिता की सेवा के दौरान मृत्यु पर करुणा आधार पर नौकरी मिली. नियुक्ति पत्र में टाइपिंग टेस्ट पास करने की शर्त थी, लेकिन वह 13 मार्च 2020 को ही पास कर सका. इसके बावजूद, नियोक्ता ने इंक्रीमेंट रोक दिए. कर्मचारी के वकीलों ने तर्क दिया कि सेवा नियमों के अनुसार प्रोबेशन अवधि अधिकतम तीन वर्ष है, जो 14 अक्टूबर 2004 को समाप्त हो चुकी थी. तीन वर्ष पूरे होने पर बिना डिस्चार्ज आदेश के वह स्वतः कन्फर्म माना जाएगा.
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के राज्य बनाम धर्म सिंह (1968) मामले का हवाला देते हुए कहा कि नियोक्ता की निष्क्रियता कर्मचारी के वैधानिक अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती. साथ ही, कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन बनाम सीपी मुंडिनामनी (2023) के फैसले का संदर्भ देते हुए जोर दिया कि इंक्रीमेंट पहले से कमाई गई हकदारी है, जिसे केवल दंड या अक्षमता साबित होने पर ही रोका जा सकता है. एफआईआर केवल जांच की शुरुआत है, न कि दोषसिद्धि. बिना चार्जशीट या अनुशासनिक कार्रवाई के इंक्रीमेंट रोकना मनमाना और अन्यायपूर्ण है.
कर्मचारी के खिलाफ 16 सितंबर 2017 को विजिलेंस ब्यूरो ने एफआईआर नंबर 12 दर्ज की थी, लेकिन चार्जशीट आज तक जारी नहीं हुई. फिर भी, 13 जून 2024 के आदेश से उसके इंक्रीमेंट, प्रमोशन और आश्वासित कैरियर प्रोग्रेशन (ACP) स्कीम के लाभ रोके गए. वकीलों ने उजागर किया कि उसके जूनियर सहकर्मी, जिनके खिलाफ भी आपराधिक मामले लंबित हैं, उन्हें 30 जून 2023 और 6 मार्च 2024 को कन्फर्मेशन मिल चुका है. यह भेदभाव कोर्ट ने अस्वीकार किया.
डीएसके लीगल के पार्टनर सुयश श्रीवास्तव ने कहा, "एफआईआर आपराधिक कानून को गति देती है, लेकिन दुराचार नहीं साबित करती. कोर्ट ने कर्मचारी को टाइपिंग टेस्ट पास करने की तारीख से इंक्रीमेंट देने, प्रोबेशन कन्फर्म करने और प्रमोशन-ACP पर विचार करने का निर्देश दिया है." कोर्ट ने तीन माह में कार्रवाई पूरी करने का आदेश दिया.
यह फैसला हजारों सरकारी कर्मचारियों के लिए राहत है, खासकर जिनके खिलाफ लंबित एफआईआर के कारण सेवा लाभ प्रभावित हो रहे हैं. कोर्ट ने कहा, "इंक्रीमेंट सेवा की मान्यता है, जो भविष्य के आचरण से अलग है. बिना सिद्ध दोष के सजा देना न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है." इस निर्णय से नियोक्ताओं को अनुशासनिक प्रक्रिया का पालन करने की याद दिलाई गई है.