नर्स निमिषा प्रिया की फांसी और हूती विद्रोही
नई दिल्ली । डेस्क: यमन के हूती विद्रोहियों से भारत के राजनयिक संबंध न होने के कारण नर्स निमिषा प्रिया की फांसी रुकवाने में कठिनाई हो रही है. नर्स निमिषा प्रिया जिसे फांसी की सजा सुनाई गई है यमन के सना केन्द्रीय जेल में बंद है और वहां हूती विद्रोहियों का नियंत्रण है.
निमिषा को उनके पूर्व बिज़नेस पार्टनर तलाल अब्दो महदी की हत्या के मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. उन्हें बचाने का एकमात्र रास्ता यही है कि महदी के परिजन उन्हें माफ़ कर दें. निमिषा के परिजन और समर्थकों ने 10 लाख डॉलर दियाह या ब्लड मनी की पेशकश की है.
सूत्रों ने बीबीसी हिंदी से कहा, "भारत सरकार अन्य माध्यमों से प्रयास कर रही है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ब्लड मनी की पेशकश को तलाल अब्दो महदी का परिवार स्वीकार नहीं कर रहा है."
गौरतलब है कि केरल के पलक्कड़ जिले की रहने वाली निमिषा 2008 में नर्सिंग के काम के लिए यमन गई थीं. अपने पति टॉमी थॉमस और बेटी के साथ वहां रहने के बाद, 2014 में उनका परिवार भारत लौट आया, लेकिन निमिषा यमन में रहीं ताकि अपना क्लिनिक शुरू कर सकें.
उसी साल उनकी मुलाकात यमनी नागरिक तालाल अब्दो माहदी से हुई, जो उनके बिजनेस पार्टनर बने. यमन के कानून के अनुसार, विदेशियों को व्यवसाय शुरू करने के लिए स्थानीय साझेदार की जरूरत होती है. 2015 में दोनों ने मिलकर एक क्लिनिक खोला, लेकिन जल्द ही उनके बीच मतभेद शुरू हो गये.
निमिषा ने आरोप लगाया कि माहदी ने उनका पैसा और पासपोर्ट छीन लिया और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में प्रस्तुत कर प्रशासनिक सहायता प्राप्त करना मुश्किल कर दिया. कई बार पुलिस से संपर्क करने के बावजूद कोई मदद नहीं मिली.
25 जुलाई 2017 को निमिषा ने माहदी को बेहोश करने के लिये नींद का इंजेक्शन दिया ताकि अपना पासपोर्ट वापस ले सकें, लेकिन ओवरडोज के कारण माहदी की मौत हो गई. इसके बाद निमिषा ने अपनी सहकर्मी हनान के साथ मिलकर माहदी के शव को टुकड़ों में काटकर पानी की टंकी में फेंक दिया. उसी महीने यमन से भागने की कोशिश में वह पकड़ी गईं.
2018 में यमनी अदालत ने निमिषा को हत्या का दोषी ठहराकर मृत्युदंड की सजा सुनाई. पिछले सात वर्षों से उनका परिवार और समर्थक उनकी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं. निमिषा की मां ने मृतक के परिवार को मुआवजा देने की पेशकश की, लेकिन माहदी के परिवार ने इसे ठुकरा दिया. दिसंबर 2024 में यमन के सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को बरकरार रखा, और राष्ट्रपति राशद अल-अलिमी ने उनकी दया याचिका खारिज कर दी.