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ईरान से युद्ध के कारण प्रत्येक अमेरिकी परिवार को $ 5000 चुकाना पड़ा

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12 मई 2026, 06:13 PM 4 मिनट में पढ़ें 2

डोनाल्ड ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप

वाशिंगटन । डेस्क: वाशिंगटन में मंगलवार को हुई एक महत्वपूर्ण सीनेट समिति की सुनवाई के दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों पर ईरान के साथ जारी युद्ध के विनाशकारी वित्तीय प्रभावों की एक भयावह तस्वीर उभर कर सामने आई है. पेंटागन द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों और शीर्ष अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया है कि इस सैन्य संघर्ष की कीमत केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा बोझ अमेरिका के मध्यम वर्गीय परिवारों की जेब पर पड़ा है. 


नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, इस युद्ध और इसके कारण उपजी वैश्विक अस्थिरता के चलते प्रत्येक अमेरिकी परिवार को औसतन पांच हजार डॉलर (लगभग 4.2 लाख रुपये) का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. यह राशि सीधे तौर पर बढ़ती महंगाई, ईंधन की आसमान छूती कीमतों और खाद्य संकट के रूप में जनता से वसूली जा रही है.

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सीनेट की सुनवाई में पेंटागन के कॉम्प्ट्रोलर जूल्स हर्स्ट ने स्वीकार किया कि युद्ध की सीधी सैन्य लागत अब बढ़कर 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई है, जो पिछले महीने के अनुमान से 4 अरब डॉलर अधिक है. 


हालांकि, सांसदों और स्वतंत्र विशेषज्ञों ने इस सरकारी आंकड़े को महज 'आइसबर्ग की नोक' बताया है. अमेरिकी प्रतिनिधि रो खन्ना ने इस दौरान एक बेहद गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कुल 631 अरब डॉलर का चपत लगा है. 


जब इस कुल आर्थिक क्षति को देश के परिवारों के बीच विभाजित किया जाता है, तो यह प्रति परिवार पांच हजार डॉलर का एक ऐसा अदृश्य कर बन जाता है, जिसे देने के लिए अमेरिकी नागरिक कभी तैयार नहीं थे.


इस आर्थिक संकट का सबसे क्रूर चेहरा आसमान छूती महंगाई के रूप में सामने आया है. श्रम विभाग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 3.8 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है, जो पिछले कई वर्षों का उच्चतम स्तर है. विशेष रूप से पेट्रोल की कीमतों में 5.4 प्रतिशत की मासिक वृद्धि ने परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत को बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर रसोई के बजट पर पड़ा है. 


हार्वर्ड की प्रसिद्ध अर्थशास्त्री लिंडा बिल्म्स ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि यदि युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों, घायल सैनिकों की देखभाल और सैन्य साजो-सामान के पुनर्निर्माण की लागत को जोड़ा जाए, तो यह आंकड़ा 1 ट्रिलियन डॉलर को भी पार कर सकता है. ऐसे में आम जनता पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ भविष्य में और भी अधिक बढ़ सकता है.


पेंटागन प्रमुख पीट हेगसेथ ने हालांकि यह दावा किया है कि सेना के पास पर्याप्त हथियार और संसाधन हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने अपने सबसे महंगे मिसाइल भंडार का लगभग आधा हिस्सा इस संघर्ष में झोंक दिया है. इसमें प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलें और पैट्रियट इंटरसेप्टर जैसे महत्वपूर्ण हथियार शामिल हैं. 


इन भंडारों को फिर से भरने के लिए करदाताओं के अरबों डॉलर आने वाले कई वर्षों तक खर्च होते रहेंगे. दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के युद्धविराम प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद युद्ध के फिर से तेज होने की आशंका बनी हुई है, जिसने शेयर बाजार और निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है.


आम अमेरिकी नागरिकों के लिए यह युद्ध अब केवल विदेशी धरती पर चल रहा एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि एक घरेलू वित्तीय आपदा बन चुका है. जैसे-जैसे नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव नजदीक आ रहे हैं, जनता के बीच इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि उनकी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ऐसे युद्ध में खर्च किया जा रहा है जिसका कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आता. 


वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है कि क्या प्रशासन के पास इस युद्ध के आर्थिक परिणामों से निपटने की कोई ठोस योजना है, या फिर अमेरिकी परिवारों को आने वाले समय में भी इसी तरह युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़ती रहेगी.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP