अल नीनो से भूख-गरीबी-मानवीय संकट बढ़ेगा
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: बदलते मौसम और अल नीनो का गहराता प्रभाव पूरी दुनिया को एक बड़े मानवीय और खाद्य संकट की ओर ढकेल रहा है. संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो अब सिर्फ समुद्र और हवा के तापमान तक सीमित कोई मौसमी बदलाव नहीं रह गया है, बल्कि यह भूख, गरीबी और मानवीय त्रासदियों को बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बन चुका है. प्रशांत महासागर में तेजी से पनप रहे इस प्रभाव के चलते आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर भोजन की उपलब्धता पर बेहद गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
वैश्विक तनाव, युद्ध और आसमान छूती महंगाई ने खाद्य पदार्थों की कीमतों को पहले ही आम जनता की पहुंच से दूर कर दिया है. उस पर से मानवीय सहायता के बजट में कटौती और जलवायु परिवर्तन के इस मिले-जुले असर से स्थितियां बेहद भयावह रूप ले सकती हैं. डब्ल्यूएफपी के अनुमान के मुताबिक, अल नीनो का सबसे विनाशकारी प्रभाव 45 बेहद संवेदनशील देशों पर देखने को मिलेगा.
वर्ष 2027 तक इन देशों में गंभीर रूप से भूखे पेट सोने वाले लोगों की संख्या 22.5 करोड़ से बढ़कर लगभग 27.4 करोड़ तक पहुंच सकती है. इसका सीधा मतलब है कि खाद्य असुरक्षा में करीब 22 प्रतिशत की भीषण बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी और लगभग 4.9 करोड़ नए लोग भोजन की भारी कमी का सामना करने को मजबूर होंगे.
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो इस तबाही का सबसे बड़ा केंद्र मध्य अमेरिका और दक्षिणी-पूर्वी अफ्रीका बनने जा रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि अकेले मध्य अमेरिका में खाद्य संकट में 83 फीसदी से अधिक का इजाफा हो सकता है. इसके अलावा दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरेबियन क्षेत्रों में भी करोड़ों परिवारों के सामने खेती-किसानी और आजीविका का अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी होगी.
एशिया और प्रशांत क्षेत्र में करीब 82 लाख अतिरिक्त लोग भोजन की किल्लत की चपेट में आ सकते हैं. चूंकि इन अधिकांश क्षेत्रों में कृषि पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर है, इसलिए सूखा, बाढ़ और अप्रत्याशित रूप से बढ़ती गर्मी फसलों को बुरी तरह तबाह कर सकती है.
वैज्ञानिक विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि अल नीनो का सबसे उग्र रूप सितंबर से दिसंबर के दौरान सामने आ सकता है, लेकिन इसका दंश फसल चक्रों को तोड़ते हुए लंबे समय तक महसूस किया जाएगा. वर्ष 2015-16 के पिछले अल नीनो के दौरान भी लगभग 10 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, लेकिन इस बार जलवायु परिवर्तन की तीव्रता और वैश्विक अस्थिरता के कारण स्थितियां पहले से कहीं अधिक बदतर नजर आ रही हैं.
हालाँकि, इस गंभीर खतरे के बीच एक राहत की बात यह है कि समय पर किए गए सटीक निवेश और अग्रिम तैयारियों से तबाही के इस आंकड़े को काफी हद तक छोटा किया जा सकता है. पूर्व में आए संकटों का अनुभव बताता है कि किसी आपदा के आने से पहले तैयारी पर खर्च किया गया एक डॉलर, भविष्य में राहत कार्यों और नुकसान के रूप में होने वाले 3 से 7 डॉलर तक के भारी-भरकम खर्च को बचा लेता है.
इसी रणनीति के तहत दक्षिण सूडान, चाड, ग्वाटेमाला और अल सल्वाडोर जैसे देशों में वित्तीय सहायता, बीमा और डिजिटल भुगतान प्रणाली के माध्यम से अग्रिम राहत योजनाएं शुरू की जा चुकी हैं. डब्ल्यूएफपी वर्तमान में 50 से अधिक देशों में सरकारों के साथ मिलकर बीज, अनाज और तकनीक उपलब्ध कराने पर काम कर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह स्थिति एक अंतिम चेतावनी की तरह है. यदि वैश्विक स्तर पर तत्काल, संगठित और समन्वित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में करोड़ों निर्दोष लोगों को भूख, विस्थापन और तंगहाली के अंधेरे में धकेला जाने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा.