छत्तीसगढ़ की 25 फ़ीसदी आबादी निरक्षर
रायपुर | आयुषी शर्मा : पिछली शताब्दी में गांवों में रात को प्रौढ़ लोगों के लिए स्कूल चलते थे. लालटेन की रोशनी में लोगों को साक्षर बनाने का युद्ध स्तर पर अभियान चलाया गया था. प्रौढ़ शिक्षा, साक्षरता अभियान, साक्षरता मिशन, राष्ट्रीय ग्रामीण साक्षरता मिशन, वयस्क शिक्षा और जाने कितने ऐसे अभियान चले और खरबों रुपये खर्च कर दिए गए. इनमें से कुछ अभियान तो आज भी जारी हैं. लेकिन 40 साल बाद पता चलता है कि छत्तीसगढ़ की लगभग 25 फ़ीसदी ग्रामीण आबादी आज भी साक्षर नहीं है !
छत्तीसगढ़ के गाँव अब भी निरक्षर हैं. लगभग 20 हज़ार गांवों वाला छत्तीसगढ़, ग्रामीण साक्षरता के मामले में देश के 36 राज्यों में 27 वें नंबर पर है. हालत ये है कि छत्तीसगढ़ की साक्षरता दर 76.6 फीसदी है, जो कि राष्ट्रीय ग्रामीण साक्षरता दर 77.5 फीसदी से भी कम है.
हाल ही में केंद्र सरकार ने लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में ये आंकड़े पेश किए हैं. इस आंकड़े के अनुसार साल 2023-24 की ग्रामीण साक्षरता रिपोर्ट के अनुसार देश के सभी 36 राज्यों में केन्द्र शासित प्रदेशों सहित लक्षद्वीप 99.5 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ पहले स्थान पर है, मिज़ोरम 98.1 पर दूसरे स्थान पर है, केरल 94.2 पर तीसरे स्थान पर है. वहीं छत्तीसगढ़ के साक्षरता दर की बात करें तो यह 76.6 फीसदी के साथ 27वें स्थान पर आता है.
छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां की सर्वाधिक आबादी गांव देहात में रहती है. किसी राज्य के विकास के लिए उस राज्य के निवासियों का साक्षर होना बहुत जरूरी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली 24.4 फीसदी आबादी निरक्षर है.
जब हम साक्षरता की बात करते हैं तो हमारा ध्यान कई तथ्यों पर जाता है कि जिस आबादी की हम बात कर रहे हैं वह कितनी जागरुक है साक्षरता के प्रति और उसकी माली हालत क्या है. ग्रामीण आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा उनके इलाके में रोजगार न होने के चलते पलायन के लिए मजबूर है और ऐसे में शिक्षा जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. खासकर मजदूर वर्ग के लिए. पर इसमें सबसे महत्वपूर्ण बिंदु ये है कि हमारी सरकारों की प्राथमिकताएं क्या हैं. शिक्षा पर हमारी सरकार का ध्यान कितना है, यह उसके द्वारा शिक्षा पर किये गये खर्च से पता चलता है.
चुनावों के दौरान भी बहुत सारे लोक लुभावन वादे राजनीतिक दलों द्वारा किए जाते हैं लेकिन शिक्षा के मुद्दे पर कम ही बात होती है. ज़ाहिर है, जब बात नहीं होती तो उससे जुड़ी समस्याओं को सुलझाने का विचार भी भला कहां से आएगा.
शिक्षा पर छत्तीसगढ़ सरकार के बजट की अगर बात करें तो पता चलता है कि साल 2023-24 में सरकार के कुल 1,21,500 करोड़ के बजट में सबसे अधिक 19,489 करोड़ रूपये स्कूल शिक्षा विभाग में खर्च किया था. साल 2022-23 की बात की जाए तो 1,04,000 करोड़ के बजट में 16,522 करोड़ रूपये जो की उस साल का सबसे अधिक था शिक्षा विभाग में खर्च हुआ.
अब आते हैं साल 2024-25 में तो कुल बजट 1,47,446 करोड़ रूपये में से सबसे अधिक 21,489 करोड़ रूपये शिक्षा में ही खर्च हुए.
छत्तीसगढ़ ने 2024-25 में शिक्षा पर अपने व्यय का 17.2% आवंटित किया. यह 2023-24 में राज्यों द्वारा शिक्षा के लिए औसत आवंटन 14.7% से कहीं अधिक है.
जब हर साल बजट में सबसे अधिक खर्च शिक्षा पर खर्च होता आ रहा है तो परिणाम क्यों नहीं आता, ये बड़ा सवाल है.
दिलचस्प है कि भारत अपनी जीडीपी का महज 2.9% – 3.2% शिक्षा पर खर्च करता है, जो अमेरिका और चीन की तुलना में काफी कम है. छोटा-सा देश जापान, अपने सकल घरेलू उत्पाद का 7.43 प्रतिशत शिक्षा में निवेश करता। इसके विपरीत, भारत ने वित्त वर्ष 2025 के लिए अपने अंतरिम बजट में शिक्षा के लिए, अपने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का केवल 4.6 प्रतिशत ही आवंटित किया है.
अपनी जनता को शिक्षित करने के लिए विश्व के कई देशों के मुकाबले कम पैसे खर्च कर भारत विश्वगुरू कैसे बनेगा यह एक अलग शोध का विषय है. जबकि भारत की शिक्षा नीति भी देश के कुल सार्वजनिक व्यय का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश करती है.
जब हम स्कूलों पर नजर डालते हैं तो एक विरोधाभासी तस्वीर देखने को मिलती है कि हम स्कूली शिक्षागत ढांचे को मज़बूत किये बिना कैसे साक्षरता के लक्ष्य को हासिल कर पायेंगे.
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर उच्च प्राथमिक विद्यालय में 2.1 और माध्यमिक विद्यालय में 14.5 है. लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर क्रमशः 0, 0.9 और 10.2 प्रतिशत है.
राज्य की राजधानी में 100 में से लगभग 15 बच्चे माध्यमिक स्कूल पहुंचते-पहुंचते पढ़ाई छोड़ देते हैं और उच्च शिक्षा में यह आंकड़ा और बढ़ जाता है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब राजधानी का ये हाल है तो राज्य के बाकी जिलों की क्या तस्वीर होगी.
अभी हाल ही में प्रकाशित असर की रिपोर्ट में भी ग्रामीण शिक्षा की जो तस्वीर सामने आई थी, वह चिंताजनक थी. कक्षा तीसरी व आठवीं कक्षा के कई विद्यार्थी कक्षा दूसरी की हिंदी की किताब नहीं पढ़ पा रहे थे. गणित में तो और ज्यादा बुरा हाल था. कई स्कूलों में तो शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी बच्चों, खासकर लड़कियों के स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारणों में से एक है.
पढ़ेगा तो आगे बढ़ेगा इंडिया, यह बात नारे में तो ठीक है लेकिन इस नारे की हकीकत यही है कि शायद इंडिया में पढ़ाई होती भी होगी लेकिन जिन गांवों में यह देश बसता है, वह भारत तो अब भी पढ़ाई-लिखाई से दूर है.