दवाओं की जांच हुई महंगी: दवा के दाम पर पड़ेगा असर
नई दिल्ली । डेस्क: देश में दवाओं और टीकों (वैक्सीन) की शुद्धता और गुणवत्ता जांचने वाली सरकारी प्रयोगशालाओं में टेस्ट कराना अब काफी महंगा होने जा रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' में एक बड़ा संशोधन किया है. इसके तहत केंद्रीय और राज्य स्तर की दवा प्रयोगशालाओं में विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और विश्लेषण की फीस में कई गुना तक की बढ़ोतरी कर दी गई है. जाहिर है कि जब दवाओं के टेस्टिंग का दाम बढ़ जायेगा तो दवाओं के दाम बढ़ना लाजिमी है.
गौरतलब है कि 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940' (Drugs and Cosmetics Act, 1940) और उसके तहत बने 'ड्रग्स रूल्स, 1945' (Drugs Rules, 1945) नियम 74 और 78 (Conditions of License) और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री के मानकों (GMP - Good Manufacturing Practices) के मुताबिक, दवाओं की यह जांच हमेशा 'बैच-दर-बैच' ही की जाती है, न कि केवल एक बार.
इस नए नियम की सबसे खास बात यह है कि अब से दवाओं की टेस्ट फीस फिक्स नहीं रहेगी, बल्कि हर साल इसमें अपने आप 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाएगी. मंत्रालय द्वारा जारी अंतिम अधिसूचना के मुताबिक, नया शुल्क ढांचा इसके प्रकाशन की तारीख से ठीक तीन महीने बाद पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू हो जाएगा.
जनता से नहीं मिला कोई विरोध, ड्राफ्ट के बाद फाइनल हुआ नियम
सरकार ने इस बड़े बदलाव को अचानक लागू नहीं किया, बल्कि इसके लिए पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया. इस नए फीस स्ट्रक्चर को लागू करने के लिए 'ड्रग्स रूल्स, 1945' की मौजूदा 'शेड्यूल बी' (Schedule B) और 'शेड्यूल बी1' (Schedule B1) को बदलने का एक मसौदा (Draft Notification) 22 जनवरी 2026 को जारी किया गया था.
सरकार ने आम जनता और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों से 30 दिनों के भीतर इस पर आपत्तियां और सुझाव मांगे थे. हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय ने अंतिम अधिसूचना जारी करते हुए स्पष्ट किया कि इस समय सीमा के भीतर जनता या किसी संगठन की तरफ से कोई भी आपत्ति या सुझाव प्राप्त नहीं हुआ, जिसके बाद सरकार ने इसे अंतिम मंजूरी दे दी.
कुछ टेस्ट की फीस 74 गुना तक बढ़ी, देखें प्रमुख बदलाव:
इस नए संशोधन के बाद कुछ जीवन रक्षक दवाओं और टीकों के परीक्षण की फीस में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, कई जरूरी टेस्ट अब पहले के मुकाबले लगभग 74 गुना तक महंगे हो गए हैं, जिससे दवा कंपनियों और रिसर्चर्स की लागत बढ़ेगी:
सांप काटने की दवा (Anti-Snake Venom): सांप के जहर को बेअसर करने वाले सीरम की क्षमता जांचने (Potency Test) की फीस वर्तमान में प्रति वेनम सिर्फ 400 रुपये थी, जिसे अब सीधे बढ़ाकर 30,000 रुपये कर दिया गया है. वहीं, इसके बायोकेमिकल टेस्ट के लिए अब 7,500 रुपये देने होंगे.
चूहों पर टेस्ट (Lethal Dose - LD10/LD50): प्रयोगशालाओं में चूहों पर दवाओं की घातक खुराक की क्षमता जांचने वाले टेस्ट की फीस 800 रुपये से 31 गुना बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी गई है.
पोलियो और टिटनेस वैक्सीन: ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) की जांच की फीस जो पहले मात्र 400 रुपये थी, अब बढ़कर 20,000 रुपये हो गई है. वहीं, टिटनेस और डिप्थीरिया के टीकों की क्षमता जांचने की फीस अब सीधे 45,000 रुपये प्रति टेस्ट तय की गई है (पहले टिटनेस के लिए यह 2,500 रुपये और डिप्थीरिया के लिए 2,700 रुपये थी).
काली खांसी (Pertussis): डीपीटी (DPT) वैक्सीन में काली खांसी के हिस्से की जांच की फीस 2,025 रुपये से बढ़ाकर 36,000 रुपये कर दी गई है.
अन्य वैक्सीन और टीकों के नए दाम:
संशोधन के तहत इन्फ्लुएंजा वैक्सीन, रोटावायरस, जापानी एन्सेफलाइटिस (J E Vaccine) और रेबीज वैक्सीन की जांच के लिए अब 20,000 रुपये की फीस चुकानी होगी. वहीं खसरा (Measles), रूबेला (Rubella) और कण्ठमाला (Mumps) के टीकों की जांच का शुल्क 10,000 रुपये प्रति टेस्ट तय किया गया है. इसके अलावा येलो फीवर, बीसीजी वैक्सीन और रेबीज मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज से जुड़े टेस्ट भी अब 10,000 रुपये में होंगे.
समझें क्या है 'शड्यूल बी' और इसके तीन नए हिस्से?:
आम जनता के समझने के लिए बता दें कि 'ड्रग्स रूल्स' के 'शेड्यूल बी' में ही यह तय होता है कि किस दवा की सरकारी लैब में जांच फीस क्या होगी. जुलाई 2024 तक इस शेड्यूल का केवल एक ही हिस्सा होता था, लेकिन अब पारदर्शिता के लिए इसे तीन अलग-अलग भागों में बांट दिया गया है:
पार्ट ए (Part A): इसके तहत केमिकल से बनने वाली सामान्य एलोपैथिक दवाओं (Chemical Drugs) की जांच होगी.
पार्ट बी (Part B): इसके तहत सभी प्रकार के मानव सीरम और टीकों (Sera and Vaccines) की जांच की जाएगी.
पार्ट सी (Part C): इसमें होम्योपैथिक, हर्बल (आयुर्वेदिक/औषधीय पौधे) और जानवरों या सूक्ष्मजीवों से बनने वाली प्राकृतिक दवाओं के टेस्ट शामिल होंगे.
आयुष (Ayush) और बिना लिस्ट वाले टेस्ट के क्या हैं नियम?:
जो टेस्ट इस नई सूची या शेड्यूल बी में शामिल नहीं हैं, उनके शुल्क का निर्धारण संबंधित प्रयोगशाला के निदेशक (डायरेक्टर) या सरकारी विश्लेषक (गवर्नमेंट एनालिस्ट) खुद करेंगे. वहीं, होम्योपैथी और अन्य आयुष (Ayush) सेगमेंट की दवाओं के टेस्ट 'शेड्यूल बी-1' (Schedule B-1) के तहत होंगे, जिसमें कुल 25 टेस्ट सूचीबद्ध हैं. इसकी फीस का निर्धारण 'फार्माकोपिया कमीशन फॉर इंडियन मेडिसिन एंड होम्योपैथी' के निदेशक आयुष मंत्रालय की सलाह से करेंगे.
नियम 7 और नियम 48 के तहत, यदि कोई आम नागरिक या खरीदार भी बाजार से खरीदी गई किसी दवा की शुद्धता जांचने के लिए सरकारी विश्लेषक को सैंपल सौंपता है, तो उसे भी इसी नई 'शेड्यूल बी' के तहत तय भारी-भरकम फीस का भुगतान करना होगा.
दवाओं के दाम पर भी असर पड़ेगा;
इस संशोधन के कारण भविष्य में दवाओं के दाम बढ़ने की पूरी संभावना है. इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं.
पहला कारण यह है कि दवा कंपनियों को बाजार में कोई भी नई दवा या वैक्सीन उतारने से पहले सरकारी प्रयोगशालाओं (लैब) से उसकी शुद्धता और क्षमता की जांच करानी होती है. अब जब इन जांचों की फीस अचानक 30 से 74 गुना तक बढ़ गई है, तो कंपनियों के लिए दवाओं को तैयार करने और उनकी टेस्टिंग कराने की लागत (इनपुट कॉस्ट) काफी ज्यादा हो जाएगी.
जब कंपनियों का खर्च बढ़ेगा, तो वे अंततः इस बढ़े हुए खर्च का बोझ ग्राहकों यानी आम जनता पर ही डालेंगी, जिससे बाजार में दवाएं महंगी हो सकती हैं.
दूसरा बड़ा कारण हर साल होने वाली 5% की ऑटोमेटिक बढ़ोतरी है. चूंकि टेस्ट की फीस अब फिक्स नहीं रहेगी और हर साल 5% महंगी होती जाएगी, इसलिए दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग लागत भी लगातार बढ़ती रहेगी.
हालांकि, भारत में कई जरूरी और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों पर सरकार (NPPA) का सीधा नियंत्रण होता है, लेकिन जिन दवाओं पर सरकारी नियंत्रण नहीं है या जो नई दवाएं और वैक्सीन रिसर्च के बाद बाजार में आएंगी, उनकी कीमतों में इस फैसले के लागू होने के बाद बढ़ोतरी देखी जा सकती है.