AI से डरे नहीं, इससे अपने काम को बेहतर बनायें
नई दिल्ली । डेस्क: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बढ़ते उपयोग से दुनिया भर के नौकरी पर गहरा असर पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने इसे श्रम बाजार पर 'सुनामी' जैसा धाक्का करार दिया है. आईएमएफ की हालिया रिपोर्ट और उनके बयानों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर औसतन 40% नौकरियां एआई से प्रभावित हो सकती हैं. कुछ नौकरियां खत्म हो सकती हैं, कुछ बेहतर हो सकती हैं, और कुछ पूरी तरह बदल सकती हैं.
उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (जैसे अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय देश) में यह प्रभाव 60% तक पहुंच सकता है, जबकि उभरते बाजारों और विकासशील देशों में यह कम है. भारत जैसे उभरते देश में एआई का प्रभाव लगभग 26% नौकरियों पर पड़ने की आशंका जताई गई है.
आईएमएफ प्रमुख ने हाल ही में विभिन्न मंचों पर चेतावनी दी है कि एआई से सबसे ज्यादा खतरा एंट्री-लेवल और रूटीन कार्य करने वाले कर्मचारियों को है, खासकर युवा पीढ़ी को. नए स्नातकों और शुरुआती करियर वाले लोगों के लिए एंट्री-लेवल जॉब्स कम हो रहे हैं, क्योंकि एआई इन कामों को तेजी और सटीकता से कर लेता है. भारत में हर साल करोड़ों युवा नौकरी बाजार में प्रवेश कर रहे हैं-2023-24 में ही करीब 1.9 करोड़ नए युवा शामिल हुए थे लेकिन एआई के कारण बेरोजगारी का संकट गहरा सकता है.
जॉर्जिएवा ने कहा कि एआई को रोकना संभव नहीं है, बल्कि इसे अपनाना होगा. सही नीतियों और तैयारी से एआई शाप नहीं, वरदान साबित हो सकता है. भारत में एआई से जीडीपी में सालाना 0.7% तक अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है, जो देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में मदद करेगी.
टीसीएस रिसर्च के सीनियर साइंटिस्ट अनिर्वाण दत्तचौधुरी ने कहा कि एआई-सुनामी का सामना करने का एकमात्र तरीका एआई को ही हथियार बनाना है. जो लोग एआई को सही ढंग से इस्तेमाल करेंगे, वही आगे रहेंगे. उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रेडियोलॉजिस्ट कर्टिस लैंगलॉट्ज का उदाहरण दिया, जिन्होंने कहा था कि एआई रेडियोलॉजिस्ट्स की जगह नहीं लेगा, लेकिन जो रेडियोलॉजिस्ट एआई इस्तेमाल करेंगे, वे बिना इस्तेमाल करने वालों से आगे निकल जाएंगे. यही बात हर पेशे पर लागू होती है. अनिर्वाण की सलाह है एआई से डरने की बजाय, इसे अपने काम को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल करें.
यादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अमित कोनार ने शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग की. उनका कहना है कि अब प्रोग्रामिंग जैसे काम एआई आसानी से कर लेता है, इसलिए स्कूल-कॉलेज स्तर पर ऐसे कौशल सिखाने चाहिए जो एआई नहीं कर सकता जैसे क्रिएटिव थिंकिंग, समस्या समाधान, नैतिक निर्णय और जटिल गणितीय आधार.
आईएसआई कोलकाता के प्रोफेसर स्वागतम् दास ने जोर दिया कि पुरानी नौकरियां बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण नई नौकरियां पैदा करना है. एआई के लिए डेटा डिजिटाइजेशन की जरूरत से बड़ी संख्या में नौकरियां आएंगी, क्योंकि बिखरे तथ्यों को व्यवस्थित करने के लिए मानव शक्ति चाहिए.
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सक्रिय भूमिका निभानी होगी रीस्किलिंग प्रोग्राम चलाने, शिक्षा में सुधार, भारतीय संदर्भ में एआई मॉडल विकसित करने और नीतियां बनाने की जरूरत है. प्रोफेसर अमिता चट्टोपाध्याय ने कहा कि नई तकनीक से हमेशा कुछ नौकरियां जाती हैं, लेकिन नई भी आती हैं. तैयारी से संक्रमण आसान होगा. हालांकि एआई में अभी खामियां हैं यह 100% सटीक नहीं, नैतिकता और मानवीय समझ की कमी है लेकिन कंपनियां लाभ के लिए इसे अपनाएंगी.
भारत में एआई अपनाने के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करना जरूरी है. तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्य आगे हैं. सही दिशा में उपयोग से एआई युवाओं के लिए अवसर पैदा कर सकता है, लेकिन बिना तैयारी के यह बेरोजगारी का बड़ा संकट बन सकता है. विशेषज्ञों का संदेश साफ है एआई को अपनाएं, स्किल्स अपडेट करें, और सरकार-शिक्षा-उद्योग मिलकर काम करें, तभी तरुण पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रहेगा.