क्या शनि ग्रह पर होती है हीरों की बारिश ?
नई दिल्ली । डेस्क: सौरमंडल का छल्लेदार ग्रह 'शनि' हमेशा से ही खगोलशास्त्रियों के लिए रहस्य और आकर्षण का केंद्र रहा है. अपनी जटिल संरचना और घने बादलों के कारण इस ग्रह के रहस्यों को सुलझाना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है.
लेकिन वैज्ञानिकों ने इस ग्रह को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और काल्पनिक प्रतीत होने वाला दावा किया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि शनि ग्रह के वातावरण में हर साल करीब 1,000 टन (10 लाख किलोग्राम) हीरे बनते हैं. अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण ये हीरे ग्रह की गहराई में गिरते हैं और माना जाता है कि नीचे जाकर पिघलकर तरल रूप ले लेते हैं.
नासा (NASA) और यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन के शोधकर्ता केविन बैनेस के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में यह दावा सामने आया है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि शनि के वायुमंडल में मुख्य रूप से हाइड्रोजन, हीलियम और मीथेन गैसें मौजूद हैं. जब इस ग्रह पर भीषण बिजली कड़कती है और तूफ़ान आते हैं, तो मीथेन गैस के अणु टूट जाते हैं. इससे निकलने वाला कार्बन कालिख या कार्बन-कणों में बदल जाता है और धीरे-धीरे वायुमंडल में नीचे की ओर गिरने लगता है.
जैसे-जैसे यह कार्बन वायुमंडल में नीचे जाता है, वहां का तापमान और दबाव अत्यधिक बढ़ने लगता है. इस उच्च दबाव के कारण कार्बन पहले ग्रेफाइट में बदलता है और फिर नीचे जाकर सख्त हीरे का रूप धारण कर लेता है.
शोधकर्ताओं का मानना है कि लगभग 30,000 किलोमीटर नीचे गिरने के बाद वहां का तापमान इतना भयानक हो जाता है कि ये ठोस हीरे पिघलकर तरल बन जाते हैं. कुछ वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि शनि की गहराई में तरल हीरों का एक समुद्र भी मौजूद हो सकता है.
हालांकि, इस प्रक्रिया का अभी तक कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है और न ही किसी अंतरिक्ष यान ने इसकी तस्वीरें ली हैं. वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में शनि जैसी परिस्थितियों का निर्माण करके यह निष्कर्ष निकाला है.
दूसरी ओर, कुछ अन्य वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि शनि पर हीरों की बारिश होने के लिए पर्याप्त कार्बन उपलब्ध नहीं है. जो भी हो, शनि का यह रहस्यमय वातावरण अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक नई बहस और शोध का विषय बन गया है.