पितृत्व विवाद सुलझाने के लिए DNA टेस्ट जरूरी- SC
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पितृत्व (paternity) के विवादों में अदालतें डीएनए टेस्ट का आदेश दे सकती हैं, बशर्ते कि मामला पूरी तरह से इसी जांच पर टिका हो और सच्चाई सामने लाने के लिए दूसरा कोई पुख्ता सबूत मौजूद न हो. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना की एक निचली अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसलों को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की.
सर्वोच्च अदालत ने माना कि जीवन में सच जानने का अधिकार और न्याय की मांग, किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार से ऊपर हो सकती है.
यह मामला 26 वर्षीय एक युवक से जुड़ा है, जिसका दावा है कि वह याचिकाकर्ता (अपीलकर्ता) का बेटा है. युवक की मां ने आरोप लगाया था कि जनवरी 1999 में उनके आपसी संबंधों के कारण ही सितंबर 1999 में इस बच्चे का जन्म हुआ था. हालांकि, याचिकाकर्ता शुरुआत से ही पितृत्व से इनकार करता आ रहा है.
इससे पहले याचिकाकर्ता को युवक की मां द्वारा दर्ज कराए गए बलात्कार के एक मामले में बरी भी किया जा चुका है. साल 2003 से 2010 के बीच दोनों पक्षों में भरण-पोषण को लेकर कई कानूनी लड़ाइयां चलीं. इसके बाद युवक ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर खुद को बेटा घोषित करने और याचिकाकर्ता की संपत्ति में एक-तिहाई हिस्से की मांग की.
जब बसना की अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डीएनए टेस्ट का आदेश दिया, तो याचिकाकर्ता ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उसका तर्क था कि उसे डीएनए सैंपल देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही इसकी कोई तत्काल आवश्यकता है. उसने अपनी निजता के अधिकार की भी दुहाई दी.
शीर्ष अदालत ने अपील को खारिज करते हुए 'हितों के संतुलन' (balance of interests) और 'अपरिहार्य आवश्यकता' (eminent need) के सिद्धांतों को लागू किया. कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में युवक के हितों का पलड़ा भारी है, जो बचपन से अपनी पहचान और हक़ की लड़ाई लड़ रहा है.
बेंच ने कहा कि निजता का अधिकार कोई पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है. यदि इस वैज्ञानिक जांच की अनुमति नहीं दी गई, तो याचिकाकर्ता का बेटा होने के नाते युवक जिन कानूनी व संपत्ति के अधिकारों का हकदार हो सकता है, वे उसे कभी नहीं मिलेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने अब संबंधित सिविल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह डीएनए टेस्ट की तारीख तय करे और रिपोर्ट के आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ाए.