डिस्काउंट फार्मेसी में नकली और खराब दवाएं मिली
डिस्काउंट फार्मेसी में नकली और खराब दवाएं मिली, उदाहरण केरल का
नई दिल्ली । डेस्क: कोझीकोड, त्रिशूर और तिरुवनंतपुरम में हाल ही में हुई छापेमारी ने केरल की दवा नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. निजी क्षेत्र के डिस्काउंट फार्मेसी में नकली और घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं का बड़ा रैकेट उजागर हुआ है, जो राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुका है. सूत्रों के अनुसार, वर्षों से आनाकानी कर रहे नियामक अधिकारियों को राज्य स्वास्थ्य मंत्री के सीधे आदेश और दबाव के बाद ही ये छापे मारे गए, जिससे विभाग की लापरवाही साफ हो गई.
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में कई निजी क्षेत्र के चेन-केमिस्ट शॉप हैं जो डिस्काउंट पर दवाएं बेचा करती हैं. इन डिस्काउंट केमिट शॉप के बाहर बोर्ड लगा रहता है कि दवाएं 20 से 40 यहां तक कि 60 फीसदी तक डिस्काउंट में मिलती है. जिससे ग्राहक पुरानी दवां दुकानों को छोड़कर इन नई दुकानों का रुख कर लेते हैं. भला, ऐसा कौन होगा जो आज के जमाने में डिस्काउंट पर माल न खरीदना चाहता हो. इस तरह की कोई जानकारी भी कभी सामने नहीं आई है कि छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य राज्यों में इन निजी क्षेत्र की डिस्काउंट फार्मेसियों में अभियान चलाकर दवाओं की गुणवत्ता की जांच की गई है. जाहिर है कि नकली दवाओं की "IED" अब तक जमीन के नीचे छिपी हुई है. जिसे जांच करने पर ही पता चलेगा कि हाल क्या है.
फार्मास्यूटिकल ट्रेड के हितधारकों ने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है. वे राज्य सरकार को केरल के पूरे दवा वितरण तंत्र पर सख्त और व्यापक निगरानी लागू करने का निर्देश देने की अपील कर रहे हैं. एर्नाकुलम की अधिकांश मार्केटिंग कंपनियां उत्तर भारत के कमजोर नियंत्रण वाले विनिर्माण इकाइयों से घटिया दवाएं खरीदकर डिस्काउंट फार्मेसी में बांट रही हैं, जहां 20 से 40 फीसदी की अत्यधिक छूट दी जा रही है. केरल में देश में सबसे अधिक दवा मार्केटिंग कंपनियां होने के कारण यह अवैध व्यापार फल-फूल रहा है, जो गुणवत्ता जांच को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा है.
फार्माबिज से बातचीत में ट्रेडर्स ने बताया कि यह संकट दोषपूर्ण निरीक्षण प्रणाली से उपजा है, जो भ्रष्टाचार और असंगति से ग्रस्त है. सामान्य मेडिकल स्टोर जो एमआरपी का पालन करते हैं, उन पर सख्ती की जाती है, जबकि शिकायतों से घिरी डिस्काउंट फार्मेसी को नजरअंदाज किया जाता है. कोट्टायम जिले के मेडिकल शॉप ओनर्स ग्रुप के एक पदाधिकारी ने कहा, "ड्रग इंस्पेक्टर सामान्य स्टोर की पूरी जांच करते हैं, लेकिन पड़ोस के डिस्काउंट फार्मेसी को छोड़ देते हैं. विभाग स्टाफ की कमी का बहाना बनाता है, लेकिन यह महज आड़ है."
ट्रेडर्स समुदाय के अनुसार, समस्या की जड़ सप्लायर्स यानी शक्तिशाली मार्केटिंग कंपनियां हैं, जो नकली दवाओं का स्टॉक जमा कर डिस्काउंट आउटलेट्स में बांट रही हैं. विभाग में कई शिकायतें दर्ज होने के बावजूद इन कंपनियों के परिसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. ऑल केरल केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन (एकेजेडीए) की जिला इकाइयों ने वित्तीय पहलू पर जोर दिया कि थोक विक्रेता को 16 फीसदी और खुदरा विक्रेता को 20 फीसदी कमीशन के साथ 8-10 फीसदी ओवरहेड खर्च जोड़ने पर 20-40 फीसदी छूट देना असंभव है. इससे साफ है कि यह मॉडल खतरनाक और नकली दवाओं के वितरण का कवर है.
इसके अलावा, डॉक्टरों द्वारा क्लिनिक के साथ चलाई जाने वाली फार्मेसी भी निशाने पर हैं, जहां दवा निर्माताओं के प्रचार से नकली दवाएं बिक रही हैं. उद्योग हितधारक आरोप लगाते हैं कि नियामक एजेंसी इन पर जानबूझकर छापे नहीं मारती, जिससे एक और अवैध चैनल फल रहा है. स्वास्थ्य कार्यकर्ता और ईमानदार ट्रेडर्स अब डीसीजीआई से अपील कर रहे हैं कि केरल सरकार को दवा नियंत्रण विभाग की पूरी पुनर्संरचना का निर्देश दिया जाए, ताकि यह एक मजबूत प्रवर्तन निकाय बने.
साथ ही, राज्य ड्रग कंट्रोलर को फार्मेसी काउंसिल में अपनी पदेन भूमिका निभाते हुए इन अनैतिक फार्मासिस्टों के पंजीकरण निलंबित करने की सिफारिश करने को कहा जा रहा है. यह घोटाला न केवल विभाग की विफलता दर्शाता है, बल्कि उपभोक्ताओं की जान को जोखिम में डालने वाली गंभीर लापरवाही को भी उजागर करता है.
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