क्या ट्रंप ने तेहरान की शर्तों के आगे घुटने टेक दिए?
इस्लामाबाद/वॉशिंगटन । डेस्क: खाड़ी क्षेत्र में पिछले कई हफ्तों से जारी तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है. संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह में तेल डिपो पर हुए हमले और तीन भारतीय श्रमिकों के घायल होने की खबरों के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया है. सोमवार को जिस 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' के तहत अमेरिकी नौसेना ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षा देना शुरू किया था, उसे मंगलवार दोपहर तक रोक दिया गया.
ट्रंप ने इस यू-टर्न के लिए पाकिस्तान और अन्य देशों के अनुरोध तथा ईरान के साथ एक "पूर्ण और अंतिम समझौते" की दिशा में हुई प्रगति का हवाला दिया है. यह घटनाक्रम संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब ईरान की उस पुरानी मांग को स्वीकार करने की ओर बढ़ रहा है, जिसमें युद्ध खत्म करने और जलमार्ग खोलने को प्राथमिकता दी गई थी, जबकि परमाणु मुद्दे को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयानों ने इस धारणा को और पुख्ता किया है. रुबियो ने मंगलवार को घोषणा की कि 28 फरवरी से शुरू हुआ सैन्य अभियान 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' अब समाप्त हो चुका है. अब अमेरिका एक 'समझौता ज्ञापन' (MoU) की तलाश में है, जो भविष्य की वार्ताओं का ढांचा तैयार करेगा. जानकारों का मानना है कि यह वॉशिंगटन की शुरुआती रणनीति से बिल्कुल विपरीत है.
मार्च में अमेरिका ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय मांगें रखी थीं, जिसमें नतांज और फोर्डो जैसे परमाणु केंद्रों को नष्ट करना और संवर्धित यूरेनियम अंतरराष्ट्रीय एजेंसी को सौंपना अनिवार्य था. लेकिन अब रुबियो कह रहे हैं कि परमाणु मुद्दा केवल "चर्चा का हिस्सा" है और फिलहाल प्राथमिकता युद्ध रोकने पर है.
तेहरान स्थित अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक सैयद मोजतबा जलालजादा का कहना है कि यह अमेरिका द्वारा अपनी क्षमताओं का वास्तविक आकलन है, क्योंकि क्षेत्र में शक्ति संतुलन फिलहाल ईरान के पक्ष में झुकता दिख रहा है.
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान और सऊदी अरब की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुलासा किया कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप को इस सैन्य मिशन को स्थगित करने के लिए प्रेरित किया. पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य मध्यस्थ के रूप में काम कर रहा है.
ईरान ने पाकिस्तान के जरिए एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें 30 दिनों के भीतर युद्ध समाप्त करने, नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, फ्रीज संपत्तियों को मुक्त करने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए एक नया प्रशासनिक तंत्र बनाने की बात कही गई थी. दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने साफ कर दिया है कि इस चरण में परमाणु वार्ता नहीं होगी.
अमेरिका का इस प्रस्ताव पर नरमी दिखाना विशेषज्ञों की नजर में एक बड़ी कूटनीतिक जीत है. किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर एंड्रियास क्रिग के अनुसार, अमेरिका ने स्वीकार कर लिया है कि युद्ध, जलमार्ग और परमाणु फाइल को एक साथ सुलझाना फिलहाल संभव नहीं है.
हालांकि, यह शांति अभी भी बेहद नाजुक है. पिछले 48 घंटों में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के आरोप लगे हैं, जिससे 8 अप्रैल का युद्धविराम खतरे में पड़ता दिखा. अमेरिका ने अपनी रणनीति बदलते हुए इन घटनाओं को "प्रमुख सैन्य अभियानों की सीमा से नीचे" बताकर तनाव कम करने की कोशिश की है. अब सारा ध्यान बीजिंग पर है, जहां ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची चीनी नेतृत्व से मिल रहे हैं.
14 मई को होने वाले ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन से पहले चीन पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है कि वह ईरान को जलमार्ग खोलने के लिए राजी करे. लेकिन चीन ने हाल ही में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों को चुनौती देकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं. इसके अलावा, 25 मई से शुरू होने वाली हज यात्रा भी एक बड़ा दबाव है, क्योंकि सऊदी अरब और अन्य मुस्लिम देश इस दौरान किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई नहीं चाहते.
फिलहाल, दुनिया एक 'वन-पेज' समझौते का इंतजार कर रही है, जो भले ही परमाणु खतरे को पूरी तरह खत्म न करे, लेकिन खाड़ी को एक बड़े विनाशकारी युद्ध से बचा सकता है.